पटना। बिहार की राजनीति में सुरक्षा का मुद्दा अक्सर चर्चा में रहता है। विशेष रूप से राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के शीर्ष नेतृत्व और उनके परिवार को मिली वीआईपी (VIP) सुरक्षा पर अब बड़े सवाल खड़े हो रहे हैं। क्या यह सुरक्षा वास्तव में जीवन की रक्षा के लिए है या फिर यह केवल सत्ता के मद और रसूख की ठसक दिखाने का एक जरिया मात्र है?
खतरे का आधार क्या है?
लोकतंत्र में सुरक्षा का प्रावधान किसी वास्तविक खतरे की स्थिति में किया जाता है न कि राजनीतिक रुतबा बढ़ाने के लिए। सवाल यह है कि राजद परिवार को आखिर किससे खतरा है? यदि हम पिछले कुछ वर्षों के घटनाक्रम पर नजर डालें तो ऐसा कोई ठोस उदाहरण सामने नहीं आता जहां इन नेताओं को किसी अपराधी द्वारा सीधी धमकी मिली हो या उनके साथ कोई गंभीर दुर्व्यवहार हुआ हो। जब खतरा स्पष्ट नहीं है तो जनता के टैक्स के पैसे से मिलने वाली यह कवच आखिर किस उद्देश्य की पूर्ति कर रही है?
जंगलराज के दौर का विरोधाभास
यह विडंबना ही है कि जिन लोगों ने अपने शासनकाल में बिहार को जंगलराज की आग में झोंका जहां अपराधी और सत्ता का गठजोड़ आम था आज वे ही सुरक्षा के सबसे बड़े लाभार्थी बने बैठे हैं। जो नेता स्वयं पर लगे भ्रष्टाचार और गंभीर आरोपों के कारण चर्चा में रहते हैं उनकी सुरक्षा के लिए बिहार पुलिस के जवानों का एक बड़ा दस्ता हमेशा तैनात रहता है। जिस राज्य की जनता आज भी अपराधियों के भय के साये में जीने को मजबूर है वहां नेताओं के काफिले में जवानों का होना आम नागरिक के लिए एक तंज जैसा है।
सुरक्षा या जनता पर बोझ?
सड़कों पर दौड़ते भारी-भरकम काफिले केवल एक संदेश देते हैं सत्ता का अहंकार। यह न केवल आम जनता के यातायात को बाधित करता है बल्कि बिहार पुलिस के उन कीमती संसाधनों की बर्बादी भी है जिन्हें अपराध नियंत्रण और कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए सड़कों पर होना चाहिए था।
समय आ गया है कि सरकार सुरक्षा के मापदंडों की पुन: समीक्षा करे। यदि कोई वास्तविक खतरा नहीं है, तो जनता की गाढ़ी कमाई से मिलने वाली इस वीआईपी सुरक्षा को अविलंब हटाया जाना चाहिए। सुरक्षा का मतलब जान बचाना है, न कि अपनी ठसक के प्रदर्शन के लिए पुलिस बल को निजी रक्षकों की तरह इस्तेमाल करना। राजद नेतृत्व को समझना होगा कि राजनीति सेवा के लिए होती है, सुरक्षा के नाम पर ‘नौटंकी’ के लिए नहीं।

