वाराणसी। शिक्षा केवल ज्ञान अर्जित करने का माध्यम नहीं, बल्कि मनुष्य को संवेदनशील बनाने और उसके संस्कारों को विस्तार देने की प्रक्रिया भी है। भारतीय ज्ञान परंपरा और राष्ट्रीय शिक्षा नीति पर हुए विमर्श में वक्ताओं ने शिक्षा में संस्कार, समान अवसर और स्वायत्तता जैसे विषयों को प्रमुखता से उठाया।

हरिभूमि के प्रधान संपादक डॉ. हिमांशु द्विवेदी ने शिक्षा में किए जा रहे नए नीतिगत बदलावों के उद्देश्य पर चर्चा करते हुए कहा कि इनका लक्ष्य मनुष्य को संवेदनशील बनाना होना चाहिए। जो शिक्षा और शिक्षा नीति संस्कारों को विस्तार ना दे सके वो व्यर्थ है। डॉ. द्विवेदी ने पौराणिक और धार्मिक कथाओं के उदाहरणों के जरिए अपने तर्कों को विस्तार देते हुए भारतीय ज्ञान परंपरा और संस्कारों के महत्व को रेखांकित किया।

बक्सर के सांसद सुधाकर सिंह ने शिक्षा की प्रशासनिक और आर्थिक स्वायत्तता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि कैंपस में सभी को समान रूप से शिक्षा मिलनी चाहिए। उन्होंने आजादी के बाद से वर्तमान समय तक की शिक्षा नीतियों की समीक्षा करते हुए उनके विभिन्न पहलुओं की विवेचना भी की।

प्रो. गुरुप्रसाद सिंह ने स्वागत वक्तव्य और विषय प्रवेश के दौरान शिक्षा में सहकार के अर्थ पर चर्चा की। उन्होंने कहा कि जिस शिक्षा की अवधारणा को हम आत्मसात करना चाहते हैं वो संस्कारों के बगैर अधूरी है। अंतर विश्वविद्यालय अध्यापक शिक्षा केंद्र ने शब्दन फाउंडेशन के सहयोग से ‘भारतीय ज्ञान परंपरा एवं राष्ट्रीय शिक्षा नीति’ विषय पर यह व्याख्यान आयोजित किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता केंद्र के निदेशक प्रो. प्रेम नारायण सिंह ने की। संचालन डॉ. शिवेंद्र राणा ने किया, जबकि अश्विनी सिंह ने धन्यवाद ज्ञापित किया।

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