”Where ignorance is bliss, ’tis folly to be wise” ”अज्ञानम परम सुखम” यानी अज्ञान ही परम सुख का द्वार है। अंग्रेजी के प्रसिद्ध कवि थॉमस ग्रे की कविता की पंक्ति ”Where ignorance is bliss, ’tis folly to be wise” समय के साथ यह एक प्रसिद्ध कहावत बनी जिसका आशय है कि सच्चाई या दुनियादारी की समझ न होना भी इंसान को चिंता और दुखों से दूर रखता है। अज्ञानम परम सुखम, यह सुनने में सरल ज़रूर है मगर इसकी व्याख्या गहरी है।

अज्ञानता में व्यक्ति कई चिंताओं, भय और जटिलताओं से दूर रहता है और एक प्रकार का सहज सुख अनुभव करता है यह तथ्य बहुत ही हैरान करने वाला लगता है मगर सत्य है। किसी कठिन सत्य से अनभिज्ञ रहने से मन शांत रहता है और बिना तनाव के जीवन व्यतीत किया जा सकता है मगर फिर भी याद रहे अज्ञानता एक ऐसी चादर है जो हमें वास्तविकता से कुछ समय के लिए तो ढक सकती है मगर लंबे समय तक नहीं। सत्य जब सामने आता है तब हमारी अज्ञानता पीड़ा बन जाती है। किसी समस्या से अनभिज्ञ रहना हमें कुछ समय तक ज़रूर राहत दे सकता है लेकिन आगे चलकर यही कष्टदायक हो जाता है।

शुरुआत में ज्ञान कठिन और कड़वा लगता है मगर जीवन को स्पष्टता और दिशा वही देता है। ज्ञान हमें सशक्त बनाकर सही निर्णय लेने में सक्षम बनाता है। अज्ञानता विकास के मार्ग मे बाधा खड़ी कर के हमें सीमित कर देता है।

इसलिए यह कहना उचित होगा कि “अज्ञान में सुख” एक भ्रम है। वास्तविक और स्थायी सुख ज्ञान, समझ और जागरूकता में है। जीवन में संतुलन आवश्यक है ज्ञानी बनें मगर Over Thinker नहीं। अनावश्यक चिंताओं से दूर और आवश्यक ज्ञान के नज़दीक रहें। सच को जानने के लायक़ ज्ञानी रहिए, सत्य को अपना सकें उतने समझदार रहिए और निश्चिंतता की नींद सो सकें उतना अज्ञानता भी अपने पास रखें।

संदीप अखिल

सलाहकार संपादक

न्यूज़ 24 मध्य प्रदेश छत्तीसगढ़/लल्लूराम डॉट कॉम

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