राकेश चतुर्वेदी की कलम से
पूर्व मुख्यमंत्री जैसा हाल होगा
पिछले दिनों मध्य प्रदेश में दो मंत्रियों की जोड़ी कुछ ज्यादा ही चर्चा में रही। वीडियो वायरल हुए तो किसी ने ‘ये दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे’ गाने के साथ रील बना दी तो किसी ने ‘बड़े मियां तो बड़े मियां, छोटे मियां सुभान अल्लाह’ से नई-नई दोस्ती की इस केमिस्ट्री को बयां किया। सोशल मीडिया से शुरू हुआ यह सिलसिला मंत्रियों के दौरे तक पहुंच गया। वो जहां भी पहुंचे उनके वायरल वीडियो चर्चा का विषय बन ही जाते। एक जगह इसी दोस्ती पर चर्चा छिड़ी तो एक मंत्रीजी के मुंह से तपाक से निकल गया कि एक-दो साल में उन मंत्रीजी का भी वही हाल होने वाला है, जो पूर्व मुख्यमंत्री का हुआ है। बात का बतंगड़ बनता उससे पहले ही बोल पड़े कि ऐसा-वैसा मत समझिए। पूर्व मुख्यमंत्री से आशय भूतपूर्व मुख्यमंत्री से है।
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मंत्रीजी खतरे में हैं
कैबिनेट का विस्तार जब होगा तब होगा, लेकिन उससे पहले ही एक मंत्रीजी की कुर्सी खतरे के घेरे में बताई जा रही है। खबर है कि प्रदेश से लेकर दिल्ली तक इस पर मंथन भी हो चुका है और विकल्पों की फाइलें भी खुल चुकी हैं। यानी चर्चा सिर्फ “अगर” की नहीं, “कौन” की भी बताई जा रही है।
उधर मंत्रीजी भी हवा का रुख समझ रहे हैं। इसलिए बैलेंसिंग कुछ ज्यादा ही दिखाई दे रही है। मुलाकातों का सिलसिला तेज है, संदेश भी जा रहे हैं और बचाव के सारे रास्ते भी टटोले जा रहे हैं। बताते हैं कि एक बार उन्हें इशारों-इशारों में खतरे की घंटी भी सुना दी गई थी. फैसला जल्द होगा या नए साल से पहले यह ऊपर वाले ही जानते हैं. यहां ऊपर वाले से मतलब आप जिसे समझ रहे हैं, वो नहीं बल्कि सत्ता के ऊपर वालों से है।
सैंपल वाली पार्टी
साहब को पार्टी देने का बड़ा शौक है। हर महीने, कभी-कभी महीने-सवा महीने में पार्टी दे ही देते हैं। खासियत यह है कि पार्टी अपने इलाके में ही होती है। ऐसे में बड़े शहरों में रहने वाले दोस्तों को परिवार सहित छोटे शहर के जिला मुख्यालय पर बुलाकर जोरदार डिनर कराया जाता है। लगातार एक ही इलाके में होने वाली इन पार्टियों की चर्चा अब दूर तक होने लगी है।
पार्टी का भी अपना एक तय प्रोटोकॉल है। आयोजन से कुछ दिन पहले साहब सैंपल कलेक्ट करने जाते हैं। किसी बड़े रेस्टोरेंट की रिपोर्ट ठीक-ठाक आए या सब कुछ सामान्य निकले तो दोस्तों के साथ डिनर का कार्यक्रम तय हो ही जाता है। डिनर पर पहुंचने के दौरान साहब के हाव-भाव भी बिल्कुल ड्यूटी वाले होते हैं। मैनेजर से लेकर स्टाफ को चेहरा पहचानने में देर नहीं लगती। फिर क्या, देखते ही देखते आवभगत शुरू हो जाती है। खातिरदारी में कोई कमी नहीं रहती।
अब सबसे दिलचस्प बात यह है कि साहब की पहचान ही ‘सैंपल वाले साहब’ की है। लिहाजा पार्टी आलीशान होती है, मेहमान भी खास होते हैं और जब बिल की बारी आए तो नजर ही नहीं आता। यानी दोस्तों की दावत भी हो जाती है और जेब पर बोझ भी नहीं पड़ता।
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26 करोड़ की नई बिल्डिंग तैयार, खंडहर पर लाखों लुटा रहा विभाग
राजधानी भोपाल में सरकारी विभागों का अपना ही निराला अंदाज है। एक तरफ करीब 26 करोड़ रुपए की लागत से शानदार और हाईटेक बिल्डिंग बनकर तैयार खड़ी है। ऐसी बिल्डिंग, जहां विभाग का पूरा कामकाज बेहतर सुविधाओं के साथ आसानी से संचालित हो सकता है, लेकिन विभाग की दिलचस्पी देखिए कि करोड़ों खर्च कर बनाई गई नई इमारत का ताला खोलने के बजाय उसकी नजरें अब भी पुराने जर्जर भवन पर टिकी हैं।
चर्चा है कि पुराने भवन को दुरुस्त करने के नाम पर लाखों रुपए खर्च करने की तैयारी चल रही है। यानी नई बिल्डिंग बनाने में करोड़ों खर्च कर दिए और अब पुराने खंडहर को संवारने के लिए सरकारी खजाने से लाखों निकालने की तैयारी है। आखिर यह कैसा सरकारी गणित है, जहां नई इमारत तैयार होने के बाद भी पुराने भवन से मोहभंग नहीं हो रहा। सवाल यह है कि 26 करोड़ की लागत से तैयार हाईटेक बिल्डिंग आखिर किस दिन काम आएगी। जब नई इमारत में तमाम सुविधाएं मौजूद हैं तो फिर पुराने भवन की मरम्मत पर सरकारी धन खर्च करने की जरूरत ही क्यों आन पड़ी। दिलचस्प यह भी है कि नई बिल्डिंग तैयार है, लेकिन उसका इस्तेमाल शुरू नहीं हो पा रहा है। क्या शिफ्टिंग में कोई तकनीकी अड़चन है या फिर फाइलों में ही नई बिल्डिंग का भविष्य कैद होकर रह गया है।
आखिर विभाग को नई बिल्डिंग में जाने से रोक कौन रहा है या फिर पुराने भवन से कुछ ऐसा मोह है कि 26 करोड़ की नई इमारत भी उसे भुला नहीं पा रही है। सरकारी खजाने से खर्च होने वाले हर रुपये का हिसाब मांगने का वक्त है, वरना कहीं ऐसा न हो कि नई बिल्डिंग उद्घाटन और इंतजार की शोभा बढ़ाती रहे और पुराना खंडहर मरम्मत के नाम पर बजट खाता रहे।
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