शिखिल ब्यौहार, भोपाल। मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में शाही कब्रिस्तान को लेकर चल रहे विवाद और कांग्रेस विधायक आतिफ अकील के हंगामे के बाद एक बहुत बड़ा प्रशासनिक खुलासा सामने आया है। प्रशासन द्वारा खंगाले गए पुराने राजस्व रिकॉर्ड्स से यह साफ हो गया है कि जिस जमीन को लेकर दावा किया जा रहा था, वह वक्फ बोर्ड की नहीं बल्कि पूरी तरह से सरकारी जमीन है।

प्रशासन की जांच और राजस्व रिकॉर्ड्स के खुलासे

विधायक के हंगामे के बाद जिला प्रशासन और राजस्व अधिकारियों ने सालों पुराने दस्तावेजों और खसरा नंबरों की गहराई से जांच-पड़ताल की। जांच में जो तथ्य सामने आए हैं, वे इस प्रकार हैं। दशकों पुराने रिकॉर्ड्स में पुष्टि: वर्ष 1959 से लेकर हालिया 2026-27 तक के राजस्व रिकॉर्ड्स में इस जमीन का मालिकाना हक सरकारी दर्ज पाया गया है।

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खसरा नंबर 208/1 का सच

रिकॉर्ड्स के मुताबिक, वर्ष 1959 में 29.87 एकड़ के खसरा नंबर 208/1 को स्पष्ट रूप से सरकारी भूमि के रूप में दर्ज किया गया था। यही स्थिति 2026-27 के ताजा दस्तावेजों और मेट्रो लैंड रिकॉर्ड्स में भी भूमि प्रक्रिया से जुड़े दस्तावेजों में बरकरार है, जहां यह जमीन सरकारी ही पाई गई है।

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सिर्फ प्रबंधन के अधिकार थे

प्रशासनिक दस्तावेजों के अनुसार, वर्ष 1958 में इस भूमि पर वक्फ को केवल इसके प्रबंधन (देखरेख) के अधिकार दिए गए थे, न कि इसका मालिकाना हक सौंपा गया था। इस बड़े खुलासे के बाद अब प्रशासनिक स्तर पर स्थिति पूरी तरह साफ हो गई है, और रिकॉर्ड्स के आधार पर यह साबित हो गया है कि संबंधित भूमि सरकारी संपत्ति है।

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