Malt Barley Farming : करनाल, 16 सितंबर 2026। भाकृअनुप्-भारतीय गेहूँ एवं जौ अनुसंधान संस्थान, करनाल में मध्य प्रदेश के कृषि अधिकारियों के लिए ‘मध्य प्रदेश में माल्ट जौ की उन्नत खेती एवं उत्पादन तकनीक’ विषय पर दो दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू हुआ। मध्य प्रदेश शासन की ओर से भेजे गए प्रतिनिधिमंडल में शिवपुरी, सतना, मैहर, सीधी, टीकमगढ़ और छतरपुर जिलों के 23 वरिष्ठ कृषि अधिकारी शामिल हो रहे हैं। प्रशिक्षण का उद्देश्य प्रदेश में जौ को व्यावसायिक फसल के रूप में बढ़ावा देने और किसानों की आय में वृद्धि के लिए आधुनिक तकनीकों की जानकारी देना है।

जौ केवल माल्ट तक सीमित नहीं

कार्यक्रम के उद्घाटन सत्र में संस्थान के निदेशक डॉ. ओमवीर सिंह ने कहा कि जौ का उपयोग सिर्फ माल्ट और औद्योगिक क्षेत्र तक सीमित नहीं है। जौ की विभिन्न किस्मों में मौजूद पोषक तत्व और जैव-सक्रिय घटक इसे स्वास्थ्यवर्धक खाद्य उत्पादों के लिए भी महत्वपूर्ण बनाते हैं।

उन्होंने छिलका रहित जौ की खूबियों पर जानकारी देते हुए बताया कि इसमें भूसी नहीं होने के कारण दाने का लगभग पूरा हिस्सा खाने के काम आता है। इसमें मौजूद घुलनशील रेशा बीटा-ग्लूकॉन स्वास्थ्य के लिए उपयोगी माना जाता है। उन्होंने बताया कि अमेरिका, यूरोप, कनाडा और भारत की खाद्य नियामक संस्थाओं ने इसके स्वास्थ्य संबंधी उपयोग को मान्यता दी है।

स्वास्थ्यवर्धक उत्पादों में बढ़ रही मांग

छिलका रहित जौ का निम्न ग्लाइसेमिक सूचकांक और आंतों के स्वास्थ्य के लिए उपयोगी गुण इसे स्वास्थ्यवर्धक अनाज की श्रेणी में महत्वपूर्ण बनाते हैं। इससे तैयार आटा, रोटी, दलिया और माल्ट आधारित उत्पादों की मांग बढ़ रही है।

डॉ. सिंह ने कहा कि माल्ट जौ माल्टिंग, मद्य निर्माण और खाद्य प्रसंस्करण उद्योगों के लिए प्रमुख कच्चा माल है। इसकी औद्योगिक मांग लगातार बनी रहती है। अनुबंधित खेती के माध्यम से किसानों को बाजार और बेहतर मूल्य मिलने की संभावना रहती है।

कम पानी में तैयार होती है फसल

माल्ट जौ की खेती की एक खासियत यह है कि इसे कम पानी में भी उगाया जा सकता है। यह सूखा सहन करने वाली और अपेक्षाकृत कम लागत वाली फसल है। ऐसे में जौ की खेती किसानों के उत्पादन जोखिम को कम करने में मदद कर सकती है।

बुंदेलखंड और विंध्य में बेहतर संभावनाएं

मध्य प्रदेश के संदर्भ में डॉ. ओमवीर सिंह ने कहा कि बुंदेलखंड और विंध्य क्षेत्र की जलवायु एवं मिट्टी जौ की खेती के लिए अनुकूल है। सीमित सिंचाई और हल्की भूमि वाले क्षेत्रों में गेहूं की तुलना में माल्ट एवं छिलका रहित जौ किसानों के लिए बेहतर विकल्प साबित हो सकते हैं।

उन्होंने कहा कि उन्नत किस्मों, बेहतर उत्पादन तकनीक और मूल्यवर्धन को अपनाकर किसान औद्योगिक बाजार के साथ-साथ स्वास्थ्यवर्धक खाद्य उत्पादों के बाजार से भी जुड़ सकते हैं। इससे किसानों की आय बढ़ाने के नए अवसर तैयार होंगे।

कृषि अधिकारियों को दी जा रही आधुनिक तकनीक की जानकारी

प्रशिक्षण कार्यक्रम के समन्वयक एवं प्रधान वैज्ञानिक डॉ. अनुज कुमार ने कार्यक्रम की रूपरेखा प्रस्तुत की। उन्होंने बताया कि प्रशिक्षण के दौरान कृषि अधिकारियों को आधुनिक उत्पादन तकनीक, गुणवत्तापूर्ण बीज उत्पादन, किस्म चयन, गुणवत्ता प्रबंधन, मूल्यवर्धन और उद्यमिता से जुड़ी नवीनतम जानकारी दी जा रही है।

इस प्रशिक्षण के माध्यम से अधिकारियों को अपने-अपने जिलों में किसानों को जौ की उन्नत खेती के संबंध में प्रभावी तकनीकी मार्गदर्शन देने में मदद मिलेगी।

विशेषज्ञों के व्याख्यान और तकनीकी सत्र

दो दिवसीय प्रशिक्षण के दौरान जौ में उद्यमिता विकास, मानव जीवन में जौ की उपयोगिता, उन्नत किस्में, गुणवत्ता एवं उपयोग, आधुनिक उत्पादन तकनीक, बीज उत्पादन और बीज रख-रखाव समेत विभिन्न विषयों पर विशेषज्ञ व्याख्यान और तकनीकी सत्र आयोजित किए जा रहे हैं।

इन सत्रों में प्रतिभागी अधिकारियों को वैज्ञानिक प्रबंधन, गुणवत्तापूर्ण उत्पादन और जौ की उपज के मूल्यवर्धन से जुड़ी व्यावहारिक जानकारी भी दी जा रही है। कार्यक्रम का समन्वय डॉ. मंगल सिंह, मुख्य तकनीकी अधिकारी द्वारा किया जा रहा है।