Tivari Sikar Monsoon Tradition: राजस्थान के मारवाड़ में जब बादल रास्ता भूल जाते हैं, तो यहां की सदियों पुरानी परंपराएं रास्ता दिखाती हैं। दरअसल, जोधपुर के तिंवरी इलाके में शुक्रवार को हाली अमावस्या पर एक ऐसी तस्वीर दिखी, जिसने आधुनिक विज्ञान को भी सोचने पर मजबूर कर दिया। यहां करीब 200 साल पुरानी परंपरा को निभाते हुए मिट्टी के घड़ों के जरिए मानसून का सटीक आकलन किया गया।

5 घड़े और 4 महीनों का गणित
बता दें कि तिंवरी में सुबह होते ही कुम्हार के घर ग्रामीणों का जमावड़ा लग गया था। परंपरा के अनुसार, चाक पर बने पांच छोटे घड़ों को एक खास आसन पर रखा गया। गौरतलब है कि इनमें से चार घड़े ज्येष्ठ, आषाढ़, श्रावण और भाद्रपद के प्रतीक थे, जबकि पांचवां घड़ा बीच में आकाश के रूप में रखा गया।
कैसे होती है गणना?
जानकारी के अनुसार, इन घड़ों में धान और पानी भरा जाता है। यहां समय का गणित बड़ा दिलचस्प है। यहां 1 मिनट का मतलब 3 दिन होता है घड़ा कितनी देर में फूटता है, उसी से बारिश के दिनों का हिसाब लगाया जाता है। ज्येष्ठ माह का घड़ा 9 मिनट बाद फूटा, यानी इस महीने बारिश थोड़ी कमजोर रह सकती है। आषाढ़ का घड़ा महज साढ़े चार मिनट में ही फूट गया, जिससे संकेत मिला है कि 27 जून से 5 जुलाई के बीच मानसून मारवाड़ में दस्तक दे देगा।
इंद्र देव को लगा बाजरे की खींच का भोग
खबर मिली है कि श्रावण और भाद्रपद के घड़ों से भी अच्छी बारिश के संकेत मिले हैं, जिससे किसानों के चेहरों पर चमक लौट आई है। पूजा के बाद कुम्हार को, जो किसान का प्रतीक माना जाता है, पांच बार पानी पिलाया गया। वहीं, परंपरा के मुताबिक एक दिन पहले भिगोए गए बाजरे से बनी खींच और गुड़-आटे की गलवानी का प्रसाद बांटा गया।
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