लखनऊ. उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 से पहले बहुजन समाज पार्टी (BSP) ने अपनी राजनीतिक तैयारियां तेज कर दी हैं. पार्टी प्रमुख मायावती 6 दिसंबर को लखनऊ में बड़ी रैली करने जा रही हैं. यह कार्यक्रम बाबासाहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर के महापरिनिर्वाण दिवस पर आयोजित होगा. इसके लिए डॉ. भीमराव अंबेडकर सामाजिक परिवर्तन स्थल को चुना गया है. मायावती इस मंच से पार्टी की ताकत दिखाने और अपने पुराने वोट बैंक को एकजुट करने की कोशिश करेंगी.
इस रैली को बसपा के चुनावी अभियान के अहम पड़ाव के तौर पर देखा जा रहा है. माना जा रहा है कि 6 दिसंबर के बाद मायावती प्रदेश में चुनावी गतिविधियां तेज कर सकती हैं. पार्टी का लक्ष्य दलित, पिछड़े और मुस्लिम मतदाताओं के बीच अपनी पकड़ मजबूत करना है.
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अखिलेश यादव के PDA फॉर्मूले को चुनौती देने की तैयारी
समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव लगातार PDA यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक राजनीति को आगे बढ़ा रहे हैं. सपा इस समीकरण के जरिए विपक्ष की राजनीति में अपनी पकड़ मजबूत करना चाहती है. ऐसे में मायावती की रैली को PDA की राजनीति के जवाब के तौर पर देखा जा रहा है. बसपा दलितों के साथ पिछड़ों, अल्पसंख्यकों और दूसरे वर्गों को जोड़ने की रणनीति पर काम कर रही है. पार्टी यह संदेश देना चाहती है कि बहुजन समाज की राजनीति पर उसका अपना दावा है.
‘वोट हमारा, राज भी हमारा’ के नारे पर जोर
मायावती इस रैली के जरिए अपने समर्थकों को एकजुटता का संदेश दे सकती हैं. पार्टी का जोर ‘वोट हमारा, राज भी हमारा’ के नारे पर है. बसपा के राष्ट्रीय महासचिव सतीश चंद्र मिश्रा और प्रदेश अध्यक्ष विश्वनाथ पाल आयोजन स्थल का निरीक्षण कर चुके हैं. मायावती बूथ स्तर पर संगठन मजबूत करने और चुनाव में अच्छे उम्मीदवार उतारने पर भी जोर दे रही हैं. वह भाजपा, सपा और कांग्रेस तीनों को निशाने पर लेती रही हैं. बसपा खुद को एक स्वतंत्र राजनीतिक विकल्प के रूप में पेश करना चाहती है.
दलितों के साथ ब्राह्मण और युवाओं पर भी नजर
बसपा की रणनीति केवल दलित वोट बैंक तक सीमित नहीं है. पार्टी ब्राह्मण, पिछड़े और मुस्लिम मतदाताओं को भी जोड़ना चाहती है. 2007 में मायावती ने बहुजन से सर्वजन का नारा देकर सोशल इंजीनियरिंग का सफल प्रयोग किया था. उस चुनाव में बसपा ने 206 सीटें जीतकर पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई थी. अब पार्टी इसी समीकरण को फिर से मजबूत करना चाहती है.
इसके अलावा युवाओं को जोड़ने पर भी जोर है. बेरोजगारी, पेपर लीक, भ्रष्टाचार और गरीबी जैसे मुद्दों के जरिए युवा मतदाताओं तक पहुंचने की कोशिश हो रही है. आकाश आनंद और ईशान आनंद की बढ़ती भूमिका को भी इसी रणनीति से जोड़कर देखा जा रहा है.
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2022 में एक सीट, वोट शेयर भी लगातार घटा
बसपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपना खोया जनाधार वापस पाना है. दरअसल, 2012 के विधानसभा चुनाव में पार्टी को 80 सीटें मिली थीं. 2017 में यह संख्या घटकर 19 रह गई. वहीं 2022 में बसपा केवल एक सीट जीत सकी. फिलहाल, विधायक उमाशंकर सिंह के निधन के बाद विधानसभा में पार्टी का कोई सदस्य नहीं है.
उधर, वोट प्रतिशत में भी गिरावट आई है. 2022 के विधानसभा चुनाव में बसपा को 12.88 प्रतिशत वोट मिले थे. 2024 के लोकसभा चुनाव में यह घटकर 9.39 प्रतिशत रह गया. ऐसे में 6 दिसंबर की रैली मायावती के लिए अपनी राजनीतिक ताकत दिखाने और कार्यकर्ताओं में नया उत्साह भरने का बड़ा मौका होगी.

