शब्बीर अहमद, भोपाल। मध्य प्रदेश में स्कूली शिक्षा व्यवस्था को लेकर केंद्र सरकार के ‘यूडाइस प्लस’ (UDISE+) पोर्टल पर बेहद चौंकाने वाले और चिंताजनक आंकड़े सामने आए हैं। यह रिपोर्ट बताती है कि राज्य में पिछले महज एक साल के भीतर करीब ढाई हजार स्कूल कम हो गए हैं। इसके साथ ही, हाईस्कूल (कक्षा 9वीं और 10वीं) में बच्चों का ड्रॉपआउट रेट (स्कूल छोड़ने की दर) बढ़कर 13 फीसदी तक पहुंच गया है। बता दें कि यह डेटा राज्य सरकारों द्वारा दी जाने वाली रिपोर्ट के आधार पर केंद्र सरकार द्वारा हर साल तैयार किया जाता है।
एक साल में बंद हुए करीब 2,500 स्कूल
रिपोर्ट के मुताबिक, मध्य प्रदेश में पिछले साल तक कुल स्कूलों की संख्या 1 लाख 22 हजार थी, जो अब घटकर करीब 1 लाख 19 हजार (2,426 स्कूल कम) रह गई है। सरकारी स्कूलों में बच्चों का लगातार कम होना और स्कूलों का बंद होना शिक्षा विभाग की नीतियों पर बड़े सवाल खड़े करता है।
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ड्रॉपआउट रेट: बड़ी क्लास में आते ही बच्चे स्कूल छोड़ रहे है। स्कूलों में बच्चों को रोके रखना सरकार के लिए बड़ी चुनौती बना हुआ है। रिपोर्ट के आंकड़े बताते हैं। कक्षा 6वीं से 8वीं: इस स्तर पर 6.02% बच्चे सरकारी स्कूल छोड़ देते हैं। कक्षा 9वीं से 10वीं: हाईस्कूल स्तर पर पहुंचते ही ड्रॉपआउट रेट बढ़कर 13% हो जाता है। ट्रेंड टीचरों का टोटा, 2,269 स्कूल सिर्फ एक शिक्षक के भरोसे मध्य प्रदेश के स्कूलों में योग्य और प्रशिक्षित (ट्रेन्ड) शिक्षकों की भारी कमी है।
स्थिति यह है
प्राइमरी स्कूलों में सिर्फ 22 फीसदी ही ट्रेंड टीचर बचे हैं। प्रदेश के 2 हजार 269 स्कूल ऐसे हैं, जो सिर्फ एक शिक्षक (सिंगल टीचर) के भरोसे चल रहे हैं। छात्र-शिक्षक अनुपात (Student-Teacher Ratio) शिक्षकों की कुल संख्या के हिसाब से प्रदेश में अनुपात इस प्रकार है
कक्षा 1 से 5वीं: 16 छात्रों पर 1 शिक्षक।
कक्षा 9 से 10वीं: 14 छात्रों पर 1 शिक्षक।
कक्षा 11वीं से 12वीं: 15 छात्रों पर 1 शिक्षक।
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बुनियादी ढांचा बदहाल
10 हजार स्कूलों में बिजली और छात्राओं के लिए टॉयलेट की कमी है। डिजिटल इंडिया और स्मार्ट क्लास के दौर में भी प्रदेश के हजारों स्कूल बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रहे हैं। प्रदेश के कुल 91 हजार 199 स्कूलों में से केवल 81 हजार स्कूलों में ही बिजली कनेक्शन है। यानी करीब 10 हजार स्कूल आज भी अंधेरे में चल रहे हैं। प्रदेश के 9 फीसदी स्कूलों में लड़कियों (छात्राओं) के लिए टॉयलेट नहीं हैं, जो छात्राओं के ड्रॉपआउट का एक बड़ा कारण माना जाता है। दिव्यांग बच्चों के लिए सिर्फ 15 फीसदी स्कूलों में ही टॉयलेट की सुविधा है। केंद्र सरकार के इस आधिकारिक डेटा ने शिक्षा व्यवस्था और ‘स्कूल चलें हम’ जैसे अभियानों के दावों की जमीनी हकीकत उजागर कर दी है।
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