शब्बीर अहमद, भोपाल। एमपी कांग्रेस में चल रही अंदरूनी खींचतान एक बार फिर खुलकर सामने आ गई है। पार्टी की प्रदेश महासचिव  बेटी निधि सत्यव्रत चतुर्वेदी ने पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह पर बेहद तीखा और सीधा हमला बोला है। उन्होंने कहा कि उज्जैन के भूमि विवाद और वीर भारत न्यास के मामले में सच क्या है और झूठ क्या, कौन सही है और कौन गलत, यह जांच का विषय हो सकता है। लेकिन एक बात जो मेरी समझ के बिल्कुल परे है -और जिसे देखकर आज हर सच्चे कांग्रेसी का सिर शर्म से झुक गया है – वह यह है कि दिग्विजय सिंह जैसे वरिष्ठ नेता को अपने ही प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी के खिलाफ इस तरह सार्वजनिक रूप से मोर्चा खोलने और अपशब्दों का इस्तेमाल करने की क्या ज़रूरत आन पड़ी?

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अगर जीतू पटवारी कहीं गलत भी थे, तो एक वरिष्ठ और मार्गदर्शक होने के नाते दिग्विजय सिंह जी उन्हें आमने-सामने बैठकर या फ़ोन करके बता सकते थे। उनके पास दिल्ली से लेकर भोपाल तक पार्टी के तमाम आंतरिक मंच उपलब्ध थे, जहाँ वे अपनी बात रख सकते थे। लेकिन इन सब मर्यादाओं को दरकिनार कर, हाथ में फ़ाइल लेकर, विशेष रूप से उज्जैन जाकर और प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाकर पत्रकारों के सामने इस बात को उछालने का क्या औचित्य है? इस तरह सरेआम मीडिया के कैमरों के सामने प्रदेश अध्यक्ष के बयान को खारिज करना और उनके लिए अमर्यादित भाषा का इस्तेमाल करना किसी भी तौर पर जायज़ नहीं ठहराया जा सकता। आखिर यह सारी कवायद क्यों की गई ? यह एक ऐसा गंभीर प्रश्न है जिसका जवाब आज संगठन का हर सच्चा कार्यकर्ता जानना चाहता है।

दिग्विजय सिंह जी की यह छटपटाहट, यह गुस्सा और यह अमर्यादित आचरण और कुछ नहीं, बल्कि ‘पुत्र-मोह’ में उठाया गया एक बेहद अशोभनीय, पीड़ादायक और निंदनीय कदम है। अपने बेटे जयवर्धन सिंह को प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी पर बैठाने की महत्वाकांक्षा में वे भूल चुके हैं कि पार्टी का अनुशासन क्या होता है।

जब देश भर में राहुल गांधी जी और हमारे लाखों समर्पित ज़मीनी कार्यकर्ता भाजपा और संघ की जनविरोधी विचारधारा के खिलाफ सड़कों पर लाठियां खा रहे हैं, संघर्ष कर रहे हैं, तब पार्टी के एक शीर्ष नेता द्वारा इस तरह की बयानबाज़ी करना उन कार्यकर्ताओं के आत्म-सम्मान और निष्ठा पर करारा तमाचा है। अपनी ही पार्टी के नेतृत्व को कमज़ोर करके दिग्विजय सिंह जी सीधे तौर पर विपक्षी खेमे को ऑक्सीजन देने का काम कर रहे हैं।

सवाल उठना लाज़मी है कि क्या दिग्विजय सिंह की यह ‘संघ-अनुकूल’ भाषा महज़ एक संयोग है या उनके पारिवारिक इतिहास का पुराना प्रभाव?

जब भी कांग्रेस मज़बूती से खड़ी होने की कोशिश करती है, इनके ऐसे गैर-जिम्मेदाराना वक्तव्य पार्टी के लिए एक नया संकट खड़ा कर देते हैं। व्यक्तिगत राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के चलते दिग्विजय सिंह जी अब खुले तौर पर इसी तर्ज पर चल रहे हैं कि – यदि मनमुताबिक कुछ हासिल न हुआ, तो रायता फैला दूँगा।

इन्हीं व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं और अंदरूनी खींचतान के चलते साल 2020 में हमारी सरकार गिरी थी, और 2023 और 2024 के चुनावों में भी कांग्रेस को करारी हार का सामना करना पड़ा था। और हालिया राज्यसभा चुनाव में जो कुछ भी हुआ, वह तो जग-जाहिर है। दिग्विजय सिंह जी की यह सोची-समझी रणनीति कि—’साँप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे’ – हर बार संगठन को खोखला करने में ही कारगर साबित होती है।

पार्टी को भीतर से खोखला करने वाले इस तरह के ‘स्लीपर सेल’ से बचने के लिए राहुल गांधी जी बार-बार हमें और पूरे संगठन को चेताते आ रहे हैं। आज मध्य प्रदेश में राहुल जी की यही चेतावनी बिल्कुल सच साबित हो रही है।

कांग्रेस हाईकमान को अब इस अनदेखी के सिलसिले को तुरंत बंद करना होगा। पार्टी की साख और कार्यकर्ताओं के मनोबल को बचाने के लिए यह अनिवार्य है कि नेतृत्व तुरंत दिग्विजय सिंह के विरुद्ध कड़ी अनुशासनात्मक कार्रवाई करे।

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