मुजफ्फरनगर की फास्ट ट्रैक कोर्ट-3 में जज रवि कुमार दिवाकर की अदालत ने नौ हत्या मामलों में 22 अभियुक्तों को फांसी की सजा सुनाई है. इनमें अधिवक्ता समीर सैफी और होमगार्ड रतिराम की हत्या के मामले भी शामिल हैं.

मुजफ्फरनगर. जिले की फास्ट ट्रैक कोर्ट-3 में पीठासीन अधिकारी रवि कुमार दिवाकर की अदालत ने नवंबर 2025 में बरेली से स्थानांतरण के बाद अब तक नौ हत्या के मामलों में 22 अभियुक्तों को फांसी की सजा सुनाई है. इन मामलों में अधिवक्ता समीर सैफी और होमगार्ड रतिराम हत्याकांड समेत कई चर्चित मामले शामिल हैं.

रवि कुमार दिवाकर वर्ष 2022 में वाराणसी के ज्ञानवापी परिसर के वीडियोग्राफी सर्वे का आदेश देने के बाद राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आए थे. मुजफ्फरनगर में उनकी अदालत द्वारा लगातार हत्या के मामलों में कड़ी सजा सुनाए जाने से ये फैसले भी चर्चा में हैं.

नौ मामलों में सजा

जिला शासकीय अधिवक्ता राजीव शर्मा के अनुसार, अदालत ने जिन नौ मामलों में 22 अभियुक्तों को मौत की सजा सुनाई है, उनमें समीर सैफी हत्याकांड, होमगार्ड रतिराम हत्याकांड, शेखर हत्याकांड, राजेश देवी हत्याकांड, राजेंद्र सैनी हत्याकांड, राजवीर हत्याकांड, राज सिंह हत्याकांड, सालिम हत्याकांड और पवन हत्याकांड शामिल हैं.

अभियोजन के अनुसार, इन मामलों को अदालत ने रेयरेस्ट ऑफ द रेयर श्रेणी में माना. जिला शासकीय अधिवक्ता ने बताया कि मुकदमों में अभियोजन पक्ष की ओर से एडीजीसी कुलदीप कुमार ने पैरवी की. अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने और उपलब्ध साक्ष्यों का परीक्षण करने के बाद गुण-दोष के आधार पर फैसले सुनाए.

राजीव शर्मा के मुताबिक, जिलाधिकारी और एसएसपी स्तर से भी अभियोजन से जुड़े मामलों की लगातार निगरानी की जाती है. उनका कहना है कि ऐसे फैसलों का समाज पर प्रभाव पड़ता है और अपराधियों में कानून का भय पैदा होता है.

समीर सैफी मामला

अधिवक्ता समीर सैफी की वर्ष 2019 में हत्या हुई थी. उनके भाई मोहम्मद दानिश के अनुसार, समीर को घर से बुलाकर ले जाया गया था. करीब छह-सात साल तक चले मुकदमे के बाद अदालत ने तीन आरोपियों को फांसी और एक आरोपी को सात साल की सजा सुनाई.

फैसले पर परिवार ने संतोष जताया. मोहम्मद दानिश ने कहा कि लंबे इंतजार के बाद परिवार को इंसाफ मिला है.

रतिराम हत्याकांड

होमगार्ड रतिराम ड्यूटी के दौरान पुलिसकर्मियों के साथ गश्त पर निकले थे. बुढ़ाना मोड़ चौकी क्षेत्र में उन पर चाकू से हमला हुआ था. गंभीर हालत में उन्हें मेरठ रेफर किया गया, जहां उपचार के दौरान तीन-चार दिन बाद उनकी मौत हो गई.

रतिराम के बेटे सुनील कुमार ने अदालत के फैसले पर संतोष जताया और मजबूत पैरवी के लिए अधिवक्ता का आभार व्यक्त किया. रतिराम की पत्नी वेदो ने कहा कि फैसले से उन्हें मानसिक संतोष मिला. उन्होंने बताया कि रतिराम परिवार के अकेले कमाने वाले थे.

सुनील कुमार ने परिवार की आर्थिक स्थिति का हवाला देते हुए मुख्यमंत्री से पिता की नौकरी पर आश्रित को नौकरी देने की मांग भी की है.

फैसलों पर हाईकोर्ट की समीक्षा

सिविल बार संघ के अध्यक्ष सुगंध जैन ने कहा कि न्यायाधीश उपलब्ध साक्ष्यों और पत्रावली में दर्ज तथ्यों के आधार पर निर्णय करते हैं. उनके मुताबिक, दोषी को सजा मिलने से समाज में यह संदेश जाता है कि अपराध करने वाला कानून से बच नहीं सकता.

हालांकि, मौत की सजा से जुड़े इन फैसलों पर अंतिम निर्णय अभी बाकी है. डेथ सेंटेंस की इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा समीक्षा के बाद ही इन सजाओं पर अंतिम मुहर लगेगी.