मुजफ्फरपुर। शहर के प्रसाद हॉस्पिटल में हुए भीषण अग्निकांड के 18 दिन बाद एक और पीड़ित ने दम तोड़ दिया है जिससे इस दुखद घटना में जान गंवाने वालों की कुल संख्या नौ हो गई है। मृतक की पहचान तुर्की थाना क्षेत्र के चढ़ुआ गांव निवासी 63 वर्षीय ई. संजीव कुमार के रूप में हुई है। संजीव कुमार ब्रेन हेमरेज के इलाज के लिए अस्पताल के आईसीयू (ICU) में भर्ती थे। घटना के दौरान जहरीले धुएं की चपेट में आने से उनके फेफड़े बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गए थे जिसके बाद उन्हें पटना के मेदांता अस्पताल में भर्ती कराया गया था।

​बेटे की बहादुरी और धुएं का कहर

​मृतक के पुत्र केशव कुमार ने घटना की भयावह रात को याद करते हुए बताया कि 29 मई की तड़के 3:45 बजे जब आग लगी तब आईसीयू धुआं-धुआं हो गया था। केशव ने अदम्य साहस दिखाते हुए नाक पर कपड़ा बांधा और जान जोखिम में डालकर अंदर प्रवेश किया। उन्होंने अस्पताल कर्मियों की मदद से अपने पिता को वेंटिलेटर और स्ट्रेचर समेत सुरक्षित बाहर निकाला। केशव का मानना है कि यदि कुछ मिनटों की और देरी होती तो उनके पिता को बचाना असंभव था।

​रेस्क्यू ऑपरेशन और मेडिकल संघर्ष

​घटना की सूचना मिलते ही पहुंची अग्निशमन टीम ने पांचवीं मंजिल स्थित आईसीयू की खिड़कियां तोड़कर अन्य मरीजों को बाहर निकाला था। शुरुआती प्राथमिक उपचार के बाद संजीव कुमार को बेहतर इलाज के लिए मेदांता रेफर कर दिया गया। डॉक्टरों के अनुसार, आग से निकले विषैले धुएं ने उनके फेफड़ों को अंदर से गंभीर रूप से झुलसा दिया था। बीते 18 दिनों से वे निरंतर वेंटिलेटर सपोर्ट पर थे लेकिन शरीर पर पड़े धुएं के दुष्प्रभाव के चलते उनकी स्थिति बिगड़ती गई और अंततः उन्होंने दम तोड़ दिया।

​सुरक्षा व्यवस्था पर खड़े हुए गंभीर सवाल

​इस ताजा मौत ने मुजफ्फरपुर सहित बिहार के निजी अस्पतालों में अग्निशमन सुरक्षा मानकों को लेकर फिर से गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं। अग्निकांड के इतने दिन बाद भी मौत का सिलसिला जारी रहना अस्पताल प्रशासन की आपातकालीन तैयारियों और सुरक्षा प्रोटोकॉल पर बड़ा सवालिया निशान लगाता है।
​इस हृदयविदारक घटना ने परिजनों को गहरा सदमा पहुंचाया है वहीं प्रशासन की कार्यशैली पर भी जनता का आक्रोश बढ़ रहा है। क्या अस्पताल प्रबंधन की लापरवाही के लिए जवाबदेही तय होगी? यह सवाल अब स्थानीय प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है।