वीरेंद्र कुमार, नालंदा। जिला एवं अपर सत्र न्यायाधीश सप्तम सह पॉक्सो स्पेशल न्यायाधीश कविन्द्र कुमार की अदालत ने एक नाबालिग दिव्यांग बच्ची के साथ छेड़खानी के गंभीर मामले में कड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने मामले में दोषी पाए गए कारू यादव को तीन साल के सश्रम कारावास की सजा सुनाई है। इसके साथ ही दोषी पर आर्थिक दंड भी लगाया गया है, जो समाज में ऐसे अपराधों के खिलाफ एक स्पष्ट और कड़ा संदेश देता है।
क्या था पूरा मामला और कैसे हुआ खुलासा?
यह पूरी घटना नालंदा जिले के चंडी थाना क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले एक इलाके की है। अभियोजन पक्ष से मिली जानकारी के अनुसार, यह घटना 26 जून 2024 की दोपहर करीब 12 बजे की है। उस दिन 13 वर्षीय दिव्यांग पीड़िता शौच के लिए घर से बाहर खेतों की तरफ गई हुई थी। इसी दौरान, आरोपी कारू यादव ने उसकी लाचारी और दिव्यांगता का फायदा उठाते हुए उसे जबरन मकई के खेत में खींच लिया और उसके साथ अछेड़खानी की।
घटना के बाद डरी-सहमी पीड़िता किसी तरह अपने घर वापस लौटी। चूंकि पीड़िता बोल नहीं सकती थी, इसलिए उसने रोते हुए इशारों के माध्यम से अपनी मां को आपबीती सुनाई। बेटी की हालत और उसकी ओर से किए गए इशारों को समझकर मां के पैरों तले जमीन खिसक गई। इसके तुरंत बाद, पीड़िता की मां ने साहस दिखाते हुए चंडी थाने में लिखित आवेदन दिया, जिसके आधार पर पुलिस ने कार्रवाई करते हुए प्राथमिकी (FIR) दर्ज की और मामले की जांच शुरू की।
अदालत का फैसला: सजा और जुर्माने का पूरा विवरण
मामले की गंभीरता को देखते हुए पॉक्सो कोर्ट में स्पीडी ट्रायल चलाया गया। सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष की ओर से पेश किए गए पुख्ता सबूतों, गवाहों के बयानों और मेडिकल रिपोर्ट को आधार बनाया गया। तमाम साक्ष्यों का बारीकी से अवलोकन करने के बाद न्यायाधीश कविन्द्र कुमार की अदालत ने आरोपी कारू यादव को पोक्सो एक्ट और अन्य सुसंगत धाराओं के तहत दोषी करार दिया।
अदालत ने दोषी को यह दंड दिए हैं:
- सश्रम कारावास: दोषी कारू यादव को 3 वर्ष के कठोर कारावास की सजा भुगतनी होगी।
- अर्थदंड: अदालत ने दोषी पर 5,000 का जुर्माना भी लगाया है।
- अतिरिक्त सजा: यदि दोषी जुर्माना राशि जमा करने में असमर्थ रहता है, तो उसे 2 महीने का अतिरिक्त साधारण कारावास भुगतना होगा।
- पीडि़ता के लिए मुआवजा: अदालत ने संवेदनशीलता दिखाते हुए पीड़िता के पुनर्वास और न्याय के तहत उसे राज्य सरकार या कानूनी प्रावधानों के जरिए 50,000 का मुआवजा देने का भी विशेष आदेश दिया है।
समाज के लिए एक कड़ा संदेश
यह फैसला इस बात का प्रतीक है कि न्यायपालिका कमजोर और विशेष रूप से सक्षम (दिव्यांग) बच्चों के अधिकारों और सुरक्षा को लेकर कितनी गंभीर है। पॉक्सो अदालतों द्वारा इस प्रकार के मामलों में स्पीडी ट्रायल के जरिए सजा सुनाए जाने से अपराधियों के हौसले पस्त होते हैं और पीड़ित परिवार को न्याय मिलने का भरोसा मजबूत होता है। स्थानीय स्तर पर भी इस फैसले की सराहना की जा रही है और इसे बाल सुरक्षा की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है।


