PM Narendra Modi 25 Years Leadership Story: प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी लोकसेवक के तौर पर आज 25 साल पूरे हो गए हैं। पीएम मोदी आज अपने जीवन में सरकार के हेड के तौर पर अपने 25 साल पूरे कर लिए हैं। नरेंद्र मोदी का सफर 7 अक्टूबर 2001 को गुजरात के सीएम की शपथ लेने के साथ शुरू हुआ था। सके लगभग 13 साल बाद वो देश के प्रधानमंत्री निर्वाचित हुए। इस अवधि में एक भी दिन ऐसा नहीं गुजरा, जब वो सत्ता के शिखर पर न रहे हों। नरेंद्र मोदी 2001 से लेकर 2014 तक गुजरात के मुख्यमंत्री रहे और 2014 से ही आज तक देश के प्रधानमंत्री हैं। गुजरात से लेकर दिल्ली के ‘पावर केंद्र’ तक पहुंचने के पीछे उनका कुशल राजनैतिक नेतृत्त्व, जमीनी समझ और राज को वाइब्रेंट बनाने का उनका कौशल है।
इतने सालों तक जनता के बीच अपनी पैठ बनाए रखना एक चमत्कार जैसा है। सत्ता राजनेता की अलोकप्रियता की वजह भी बनती है, लेकिन नरेंद्र मोदी इस मामले में अपवाद हैं। उनके राजनीतिक कौशल के कारण यह सब हो पाया है। एक छोटे बच्चे से लेकर युवा और हमउम्र बुजुर्गों के बीच मोदी आज भी देश के सबसे चहेते नेता बने हुए हैं।
7 अक्टूबर 2001 कोनरेंद्र मोदी को भाजपा संगठन के राष्ट्रीय महामंत्री पद से हटा कर गुजरात का मुख्यमंत्री बनाया गय़ा था। तब सभी लोग भौंचक्के रह गए थे, क्योंकि उस समय गुजरात राजनीतिक अस्थिरता के दौर से गुजर रहा था। 1998 में हुए मध्यावधि चुनाव में बीजेपी की जीत के साथ ही 4 मार्च 1998 को केशूभाई पटेल ने राज्य की कमान संभाली। हालांकि 26 जनवरी 2001 में कच्छ के भूकंप से गुजरात तबाह हो गया। अंत में 7 अक्टूबर 2001 को उनकी विदाई हो गई और उसी दिन हरियाणा, हिमाचल में संगठन की तरफ से प्रभारी नरेंद्र मोदी को गुजरात लाकर मुख्यमंत्री बना दिया गया। कद्दावर नेता केशूभाई पटेल को हटाकर मोदी को गुजरात का सीएम बनाना हर किसी को चौंका दिया। हालांकि भाजपा आलाकमान के फैसले को उन्होंने कभी भी गलत साबित नहीं होने दिया। वहीं गुजरात नरेंद्र भाई मोदी के लिए मील का पत्थर साबित हुआ।

जाति और संप्रदाय की प्रयोगशाला बना हुआ था गुजरात
जिस गुजरात में चिमन भाई पटेल से ले कर केशूभाई पटेल तक अनेक प्रयोग हुए। जहां माधव सिंह सोलंकी से लेकर झीनाभाई दर्जी तक अनेक जातीय प्रयोगशालाएं पनपीं, उसी गुजरात में नरेंद्र मोदी ने एक ऐसी सरकार दी कि आज तक उनकी पार्टी वहां जमी हुई है। माधव सिंह सोलंकी ने 1960 में बंबई से अलग हो कर बने राज्य गुजरात में खाम पॉलिटिक्स शुरू की। KHAM यानी क्षत्रिय, हरिजन, आदिवासी और दलित वोटों के आधार पर जातीय प्रयोग करना। इस पॉलिटिक्स के चलते गुजरात से बनिया, पटेल और ब्राह्मण हाशिये पर आ गए और 1980 से शुरू इस राजनीति के चलते माधव सिंह सोलंकी का 1980 और 1985 के विधानसभा चुनाव में खूब जलवा रहा। वो तीन बार मुख्यमंत्री और नरसिंह राव सरकार में विदेश मंत्री रहे।

गोधरा नरसंहार भी नहीं डिगा पाया
गुजरात के गोधरा में 27 जनवरी 2002 को साबरमती एक्सप्रेस ट्रेन में आगजनी के बाद पूरे गुजरात में हिंसा, मारधाड़, आगजनी शुरू हो गई। तब नरेंद्र मोदी को मुख्यमंत्री बने कुल चार महीने हुए थे। साबरमती में हिंदू तीर्थयात्री अयोध्या से लौट रहे थे कि उसके एक कोच में आग लग गई और 58 तीर्थयात्री मारे गए थे। गोधरा मुस्लिम बहुल क्षेत्र है, इसलिए हिंदुओं ने दोष मुसलमानों पर लगाया और मार्च में हिंदू-मुस्लिम दंगा हो गया। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, इस दंगे में 790 मुस्लिम और 294 हिंदू मारे गए। राज्य सरकार दंगों को फ़ौरन रोक नहीं पाई, इसके बाद मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुजरात के विकास, उद्यमशीलता पर जोर देना शुरू किया। इसका लाभ यह हुआ कि गुजरात में हर वर्ष होने वाली सांप्रदायिक और जातीय हिंसा थम गई। यही उद्यमशीलता वाइब्रेंट गुजरात रही।

देश की राजनीति में भी स्थिर नेतृत्त्व
2013 लोकसभा चुनाव में नरेंद्र भाई मोदी को बीजेपी ने अगले लोकसभा चुनाव में अपना पोस्टर बॉय घोषित किया। नतीजा अपेक्षा के अनुरूप निकला और बीजेपी पूर्ण बहुमत के साथ लोकसभा में विजयी रही। 22 मई 2014 को नरेंद्र भाई मोदी देश के प्रधानमंत्री नियुक्त हुए। इसके बाद 2019 और 2024 का लोकसभा चुनाव भी बीजेपी ने नरेंद्र मोदी के चेहरे पर जीता। इस तरह नरेंद्र पिछले तीन बार से लगातार प्रधानमंत्री हैं। उन्होंने सामाजिक, राजनैतिक और रणनैतिक कौशल से दुनिया भर में देश को नये रूप में प्रतिष्ठित किया।
सुधारों ने आसान बनाया रास्ता
2014 में मोदी जब गांधीनगर से दिल्ली आए, तो उद्योग और विनिर्माण की उनकी समझ को पूरे देश में लागू करने का बड़ा अवसर मिला। GST, दिवाला और दिवालियापन संहिता, डिजिटल व्यवस्था, नए श्रम कानून – उन्होंने कई ऐसे सुधार किए, जिनसे उद्योगों के लिए काम करना आसान हुआ। बुनियादी ढांचे पर बड़े पैमाने पर खर्च ने भारतीय उद्योग की एक पुरानी समस्या को दूर करने में मदद की। समस्या थी सामान को एक से दूसरी जगह ले जाने में लगने वाला ज्यादा समय और खर्च। सड़कें, रेलवे, बंदरगाह, हवाई अड्डे और एक्सप्रेस वे अब देश की अर्थव्यवस्था की मुख्य नसों की तरह काम कर रहे हैं।
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