दुर्गेश राजपूत, नर्मदापुरम। मध्य प्रदेश के नर्मदापुरम में खाकी और वन विभाग के रसूखदार अधिकारियों की बर्बरता के खिलाफ आदिवासियों का गुस्सा ज्वालामुखी बनकर फूट पड़ा है। तीन दिनों तक बंधक बनाकर बेरहमी से पीटना, जातिसूचक गालियां देना और करंट लगाने जैसे रोंगटे खड़े कर देने वाले आरोपों ने पूरे प्रदेश को हिलाकर रख दिया है। हैरानी की बात यह है कि पीड़ित आदिवासी डेढ़ महीने तक एसपी और कलेक्टर के दफ्तरों के चक्कर काटते रहे, लेकिन ‘साहबों’ के कान पर जूं तक नहीं रेंगी। सवाल उठता है कि आखिर एसडीओ (SDO) अनिल विश्वकर्मा को किसका संरक्षण प्राप्त है? क्या वन विभाग के बड़े अफसर अपने ही महकमे के गुनहगारों को बचाने के लिए इस खौफनाक मामले को दबाना चाहते है?
इंसाफ की आस खो चुके आदिवासियों ने जब सड़कों पर उतरकर 24 घंटे का ऐतिहासिक धरना शुरू किया, तो प्रशासन में हड़कंप मच गया। आखिरकार प्रभारी कलेक्टर हिमांशु जैन को खुद मैदान में आना पड़ा। आदिवासी संगठनों और प्रशासन के बीच 15 मिनट की तीखी बहस के बाद एक विशेष जांच टीम (SIT) गठित करने का लिखित आश्वासन देकर जैसे-तैसे इस धरने को शांत कराया गया। आदिवासी संगठन के संयोजक दुर्गेश धुर्वे ने इसे समाज की बड़ी जीत बताते हुए खुली चेतावनी दी है।
आदिवासी बोले- 5 दिन का सीजफायर, न्याय नहीं मिला तो…
उन्होंने कहा कि निष्पक्ष जांच हो, जांच टीम में आदिवासी संगठन के सदस्य शामिल हों। दोषियों पर एफआईआर दर्ज कर उन्हें तुरंत बर्खास्त किया जाए। आदिवासियों पर दर्ज झूठे मुकदमे वापस हों और पीड़ितों को मुआवजा मिले। आदिवासियों ने साफ कह दिया है कि यह सिर्फ 5 दिन का सीजफायर है। अगर 5 दिन में न्याय नहीं मिला, तो पूरे मध्य प्रदेश से आदिवासी भाई नर्मदापुरम की धरती पर ऐसा उग्र प्रदर्शन करेंगे, जिसे संभालना प्रशासन के बस की बात नहीं होगी। अब देखना यह है कि इस कड़कती धूप में सुलग रही आदिवासियों की इस आग को प्रशासन इंसाफ से शांत करता है या फिर से लीपापोती की कोशिश होगी।

