NEET और भर्ती परीक्षाओं में पेपर लीक का मुद्दा युवाओं के भविष्य से जुड़ा है, जिसे राहुल गांधी ने आक्रामक रूप से उठाया है। क्या यह कांग्रेस के लिए सत्ता का रास्ता बनेगा?

कृष्ण कुमार सैनी, चंडीगढ़। देश की राजनीति में लंबे समय बाद ऐसा मुद्दा सामने आया है जिसने जाति, धर्म और क्षेत्रीय समीकरणों से आगे बढ़कर सीधे युवाओं की भावनाओं को छूने का काम किया है। NEET परीक्षा, पेपर लीक और भर्ती परीक्षाओं में लगातार सामने आ रहे घोटालों ने लाखों छात्रों के भविष्य पर सवाल खड़े किए हैं। इसी मुद्दे को लेकर कांग्रेस और राहुल गांधी आक्रामक नजर आ रहे हैं। सवाल यह है कि क्या यह मुद्दा राहुल गांधी के लिए राजनीतिक संजीवनी साबित होगा या फिर यह भी कुछ समय बाद दूसरे मुद्दों की तरह ठंडा पड़ जाएगा।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बेरोजगारी और परीक्षा घोटाले ऐसे विषय हैं जिनका सीधा असर देश के करोड़ों युवाओं और उनके परिवारों पर पड़ता है। कांग्रेस लगातार यह नैरेटिव बनाने की कोशिश कर रही है कि शिक्षा व्यवस्था “अवसर” नहीं बल्कि “वसूली तंत्र” बन चुकी है। राहुल गांधी का “छात्रों की गूंज” अभियान भी इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है, जिसके जरिए युवाओं को यह संदेश दिया जा रहा है कि उनकी लड़ाई संसद से सड़क तक लड़ी जाएगी।

हालांकि राजनीतिक रूप से देखें तो केवल मुद्दा उठाना और उसे वोट में बदलना दो अलग-अलग बातें हैं। 2024 के बाद कांग्रेस ने युवाओं, छात्रों और बेरोजगारों के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश जरूर की है, लेकिन भाजपा अभी भी संगठन, संसाधन और चुनावी मशीनरी के मामले में कहीं आगे दिखाई देती है। ऐसे में कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि वह युवाओं के गुस्से को स्थायी राजनीतिक समर्थन में कैसे बदले।

दूसरी तरफ भाजपा के लिए यह मुद्दा असहज करने वाला जरूर है। विपक्ष लगातार यह सवाल उठा रहा है कि यदि परीक्षा प्रणाली सुरक्षित है तो बार-बार पेपर लीक की घटनाएं क्यों सामने आ रही हैं। युवाओं के बीच बढ़ती नाराजगी और सोशल मीडिया पर सरकार विरोधी प्रतिक्रियाएं भाजपा के लिए चिंता का विषय बन सकती हैं। हालांकि भाजपा की रणनीति अब तक यही रही है कि दोषियों पर कार्रवाई और सुधारात्मक कदमों को सामने रखकर नुकसान को सीमित किया जाए।

राजनीतिक दृष्टि से देखें तो पेपर लीक और NEET विवाद कांग्रेस के लिए फिलहाल एक मजबूत “पायदान” बनता दिखाई दे रहा है। यह वही वर्ग है जिसे लंबे समय से भारतीय राजनीति में निर्णायक वोट बैंक माना जाता है। यदि राहुल गांधी इस मुद्दे को केवल विरोध तक सीमित न रखकर ठोस समाधान और वैकल्पिक शिक्षा-रोजगार मॉडल के साथ जोड़ने में सफल रहते हैं, तो यह कांग्रेस के लिए सत्ता के वनवास को खत्म करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है।

लेकिन अंतिम निष्कर्ष यही है कि पेपर लीक का मुद्दा भाजपा के लिए राजनीतिक नुकसान और कांग्रेस के लिए अवसर जरूर बना है, मगर चुनावी लाभ तभी मिलेगा जब युवाओं का यह आक्रोश मतदान केंद्र तक पहुंचे। फिलहाल लड़ाई सिर्फ परीक्षा व्यवस्था की नहीं, बल्कि करोड़ों युवाओं के भरोसे की है, और आने वाले वर्षों में यही भरोसा भारतीय राजनीति की दिशा तय कर सकता है।

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