पंचकूला की एक अदालत ने ठोस सबूत न होने के कारण एक स्टोन क्रशर संचालक को 49 लाख रुपये से अधिक की बिजली चोरी के केस से सम्मान बरी कर दिया है। बिजली विभाग ने साल 2015 में इस मामले में प्राथमिकी दर्ज कराई थी, जिसमें वैज्ञानिक साक्ष्यों के विरोधाभास के चलते आरोपी को राहत मिली।

पंचकूला। जिले में न्यायपालिका ने एक अहम फैसला सुनाते हुए स्टोन क्रशर संचालक पर लगे करीब 49 लाख रुपये के बिजली चोरी के आरोप को पूरी तरह से खारिज कर दिया है। इस मामले में 11 वर्षों की लंबी कानूनी प्रक्रिया के बाद आरोपी व्यवसायी राज कुमार अग्रवाल को पंचकूला अदालत ने निर्दोष करार देते हुए बाइज्जत बरी कर दिया है। सुनवाई के दौरान न्यायालय ने स्पष्ट किया कि सरकारी महकमा अपने आरोपों की पुष्टि के लिए कोई भी पुख्ता साक्ष्य प्रस्तुत करने में पूरी तरह से विफल रहा है। यह पूरा विवाद 9 सितंबर 2015 को शुरू हुआ था, जब बिजली निगम के एक जांच दल ने टांडा गांव में संचालित मेसर्स शक्ति स्टोन क्रशर पर छापा मारा था। निरीक्षण के दौरान क्रशर यूनिट में लगा हुआ बिजली का मीटर पूरी तरह से झुलसा हुआ पाया गया था। उस समय विभाग की तरफ से यह दलील दी गई थी कि उपभोक्ता ने बिजली की चोरी करने के मकसद से मीटर पर डीजल छिड़क कर उसे जानबूझकर आग के हवाले किया था।

मुकदमा और संचालक की गिरफ्तारी

राजस्व हानि का आकलन करते हुए बिजली विभाग ने क्रशर संचालक पर 42.23 लाख रुपये की जुर्माना राशि और 6.80 लाख रुपये का शमन शुल्क (कंपाउंडिंग फीस) जोड़कर कुल 49.03 लाख रुपये का भारी-भरकम क्लेम ठोक दिया था। इस निर्धारित रकम की अदायगी न होने के चलते 1 अक्टूबर 2015 को बिजली कानून की धारा 135 के तहत एक आपराधिक मुकदमा दर्ज करवाया गया, जिसके बाद पुलिस ने कार्रवाई करते हुए क्रशर संचालक राज कुमार अग्रवाल को हिरासत में ले लिया था।अदालत में मामले की सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने अपनी बात को सही साबित करने के लिए उपमंडल अभियंता (SDO), कनिष्ठ अभियंता (JE) और फोरमैन सहित कुल 18 गवाहों को अदालत के समक्ष पेश किया। हालांकि जिरह के दौरान विभाग के ही कई गवाहों ने इस बात को स्वीकार किया कि छापेमारी स्थल से बिजली चोरी के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला कोई भी बाहरी तार, बाईपास उपकरण या अन्य संदिग्ध सामान बरामद नहीं हुआ था। इसके अलावा बिजली विभाग की अपनी एम एंड टी प्रयोगशाला भी मीटर में आग लगने की असली वजह को स्पष्ट तौर पर निर्धारित नहीं कर सकी थी।

जांच रिपोर्टों में मिला भारी विरोधाभास

न्यायालय ने अपने आदेश में रेखांकित किया कि मामले से जुड़े वैज्ञानिक दस्तावेजों में ही आपस में भारी विरोधाभास था। जहां एक जांच रिपोर्ट में जले हुए उपकरण के भीतर डीजल के अंश होने का दावा किया गया था, वहीं दूसरी वैज्ञानिक रिपोर्ट में यह आशंका जताई गई थी कि यह हादसा शॉर्ट सर्किट की वजह से भी हो सकता था। न्यायाधीश ने कहा कि जब वैज्ञानिक तथ्य ही आपस में मेल नहीं खा रहे हों और मौके का कोई प्रत्यक्ष प्रमाण उपलब्ध न हो, तो महज संदेह के आधार पर किसी भी नागरिक को गुनहगार नहीं माना जा सकता। इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह रहा कि संचालक राज कुमार अग्रवाल ने छापामार कार्रवाई से पहले यानी 2 सितंबर 2015 को ही स्वयं बिजली विभाग को एक लिखित अर्जी देकर मीटर जलने की जानकारी दी थी और नया उपकरण लगाने की गुहार लगाई थी। अदालत ने इस पर विशेष टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि उपभोक्ता का इरादा अवैध तरीके से बिजली का उपभोग करने का होता, तो वह खुद आगे बढ़कर सरकारी दफ्तर को अपना मीटर खराब होने की सूचना कभी नहीं देता।