पंचकूला: हरियाणा में पंचकूला के जिमखाना क्लब को 25 साल के लिए निजी कंपनी को लीज पर दिए जाने का मामला अब राजनीतिक विवाद में घिर गया है। करीब ढाई एकड़ में फैली इस सरकारी संपत्ति की मौजूदा कीमत करीब 150 करोड़ रुपये बताई जा रही है, जबकि इसे महज 22 लाख रुपये सालाना के लाइसेंस शुल्क पर निजी कंपनी को देने को लेकर सवाल उठ रहे हैं। विपक्ष ने इसे सरकारी संपत्ति के कम मूल्य पर निजी हाथों में सौंपने का आरोप लगाते हुए नायब सरकार को घेरा है।

मामला हरियाणा शहरी विकास प्राधिकरण (HSVP) के जिमखाना क्लब सेक्टर-3 की संपत्ति से जुड़ा है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक क्लब के संचालन के लिए टेंडर प्रक्रिया के तहत करीब 15 लाख रुपये वार्षिक आरक्षित मूल्य रखा गया था। इसके बाद फरीदाबाद की एक कंपनी को 22 लाख रुपये वार्षिक लाइसेंस फीस पर क्लब आवंटित किया गया।

25 साल में करीब 5.50 करोड़ रुपये ही आएंगे

विपक्ष का तर्क है कि करीब 150 करोड़ रुपये की मौजूदा कीमत वाली सरकारी जमीन और संपत्ति को 22 लाख रुपये सालाना के हिसाब से 25 वर्षों के लिए देने से सरकार को पूरी अवधि में करीब 5.50 करोड़ रुपये ही प्राप्त होंगे। अगर पांच साल का संभावित विस्तार भी शामिल किया जाए तो 30 वर्षों में यह रकम करीब 6.60 करोड़ रुपये बैठती है।

सवाल यह उठाया जा रहा है कि जब पंचकूला में जमीन और संपत्तियों के दाम लगातार बढ़ रहे हैं, तो लीज की लंबी अवधि को ध्यान में रखते हुए भविष्य में संपत्ति की बढ़ने वाली कीमत का आकलन क्यों नहीं किया गया।

टेंडर प्रक्रिया की टाइमिंग पर भी सवाल

मामले में टेंडर प्रक्रिया को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। आरोप है कि सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार टेंडर 1 सितंबर 2024 को खोला जाना था, लेकिन इसे करीब नौ महीने बाद मई 2025 में खोला गया। विपक्ष ने इस देरी को भी सरकारी हितों के लिए नुकसानदेह बताते हुए पूरी प्रक्रिया पर सवाल खड़े किए हैं।

‘सरकारी संपत्ति निजी हाथों में सौंपने का आरोप’

विपक्ष ने मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी पर भी निशाना साधा है। उसका कहना है कि HSVP के चेयरमैन मुख्यमंत्री स्वयं हैं, इसलिए इतनी मूल्यवान सरकारी संपत्ति को लंबी अवधि के लिए कम वार्षिक राशि पर देने के फैसले की जिम्मेदारी सरकार से तय होनी चाहिए।

विपक्ष का आरोप है कि मौजूदा कीमत करीब 150 करोड़ रुपये वाली संपत्ति को 25 से 30 वर्षों के लिए बेहद कम राशि पर देना सरकारी खजाने के हितों के खिलाफ है। हालांकि, इन आरोपों पर सरकार या संबंधित विभाग की ओर से विस्तृत आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने आना बाकी है।

अब पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या पंचकूला की इतनी बेशकीमती सरकारी संपत्ति को लीज पर देने की शर्तें सरकार के आर्थिक हितों के अनुरूप थीं और टेंडर प्रक्रिया में देरी क्यों हुई? विपक्ष ने सरकार से पूरे मामले की पारदर्शी जांच और लीज की शर्तों की समीक्षा की मांग उठाई है।