पंचकूला। हरियाणा के चर्चित IDFC First Bank घोटाले की जांच कर रही केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) अब इस साजिश के असली खिलाड़ियों तक पहुंचने में जुट गई है। एजेंसी का मानना है कि अब तक गिरफ्तार आरोपी इस बड़े नेटवर्क के केवल मोहरे हो सकते हैं।

CBI के एडिशनल एसपी पुष्पपाल पॉल के अनुसार, आरोपियों के न्यायिक हिरासत में जाने के बाद कई अहम तथ्य सामने आए हैं। जांच में खुलासा हुआ है कि घोटाले की रकम नकद निकाली गई और अलग-अलग लाभार्थियों तक पहुंचाई गई, जिनमें मास्टरमाइंड के शामिल होने की आशंका है।

जांच के दौरान हरियाणा एंटी करप्शन ब्यूरो और CBI की टीमों ने डिजिटल फुटप्रिंट्स और दस्तावेजी साक्ष्य जुटाए हैं। अब तक की जांच में सामने आया है कि बैंक रिकॉर्ड में हेरफेर कर फर्जी दस्तावेजों के जरिए सरकारी धन की हेराफेरी की गई। साथ ही IDFC First Bank और AU Small Finance Bank में फर्जी दस्तावेजों के आधार पर खाते खोले गए।

CBI ने हरियाणा एंटी करप्शन ब्यूरो द्वारा 23 फरवरी 2026 को दर्ज एफआईआर के आधार पर अपना मामला दर्ज कर जांच शुरू की है।

590 करोड़ के गबन में 6 आरोपी रिमांड पर

करीब 590 करोड़ रुपये के गबन मामले में CBI की कार्रवाई तेज हो गई है। दिल्ली CBI टीम ने रिभव ऋषि समेत छह आरोपियों को प्रोडक्शन वारंट पर कोर्ट में पेश किया, जहां से उन्हें दो दिन के रिमांड पर भेजा गया।

रिमांड पर लिए गए अन्य आरोपियों में अभय कुमार, स्वाति, अभिषेक सिंगला, नरेश कुमार और मनीष जिंदल शामिल हैं।

CBI ने कोर्ट में दलील दी कि पूरे नेटवर्क और घोटाले के मास्टरमाइंड तक पहुंचने के लिए आरोपियों से गहन पूछताछ जरूरी है। सभी आरोपियों का सेक्टर-6 स्थित नागरिक अस्पताल में मेडिकल भी कराया गया।

शेल कंपनियों के जरिए घुमाई गई रकम

जांच में यह भी सामने आया है कि आरोपी नए बैंक खाते खोलकर उनमें पैसे ट्रांसफर करते थे और रिकॉर्ड में हेरफेर कर फर्जी दस्तावेज तैयार करते थे। गबन की राशि को पहले शेल कंपनियों में भेजा जाता, फिर कई खातों में घुमाकर अंत में नकद निकासी की जाती थी, जिससे ट्रांजेक्शन को ट्रैक करना मुश्किल हो जाए।

CBI अब आरोपियों का आमना-सामना कराकर पूरे नेटवर्क और वित्तीय लेनदेन की कड़ियों को जोड़ने में जुटी है। एजेंसी ने कोर्ट को बताया कि यह गंभीर आर्थिक अपराध है, जिसमें आजीवन कारावास तक का प्रावधान है।

गौरतलब है कि इस मामले की शुरुआत हरियाणा स्टेट विजिलेंस की कार्रवाई से हुई थी। फरवरी 2026 में मामला दर्ज होने के बाद एसआईटी जांच में 15 आरोपियों को गिरफ्तार किया गया था। बाद में राज्य सरकार ने केस की गंभीरता को देखते हुए जांच CBI को सौंप दी, जिसने 8 अप्रैल 2026 को मामला दर्ज कर तेजी से कार्रवाई शुरू की।