वीरेन्द्र गहवई, बिलासपुर। पत्नी पर संदेह करते हुए ढाई साल के बेटे की हत्या करने वाले का आजीवन कारावास हाईकोर्ट ने बरकरार रखा है। हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने कहा कि अपराध बेहद गंभीर है और दोषी को राहत नहीं दी जा सकती।

चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा, जस्टिस बीडी गुरु की डिवीजन बेंच ने आजीवन कारावास की सजा भुगत रहे दुर्ग निवासी योगेश टंडन की सजा निलंबन और जमानत के लिए दायर याचिका खारिज कर दी। कोर्ट ने कहा कि अपराध की प्रकृति, उसकी गंभीरता, पोस्टमार्टम रिपोर्ट और उपलब्ध साक्ष्यों को देखते हुए इस स्तर पर न तो सजा निलंबित की जा सकती है और न ही जमानत दी जा सकती।
क्या है मामला
दरअसल, आरोपी को संदेह था कि बच्चा उसका जैविक पुत्र नहीं है और वह पत्नी के चरित्र पर भी शंका करता था। इसी वजह से पति-पत्नी के बीच अक्सर विवाद होता था। 27 जुलाई 2022 को दोनों के बीच झगड़ा हुआ, जिसके बाद पत्नी मायके चली गई। उस समय ढाई साल के बच्चे सहित तीन और बच्चे आरोपी की देखरेख में ही घर पर थे। इसी बीच ढाई साल के बच्चे की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई। जांच के बाद पुलिस ने आरोपी के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज किया। सुनवाई के बाद दुर्ग के प्रथम अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ने 10 अप्रैल 2024 को भारतीय दंड संहिता की धारा 302 के तहत दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास और 500 रुपये जुर्माने की सजा सुनाई।
आरोपी ने हाईकोर्ट में दायर की थी याचिका
आरोपी ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर सजा निलंबन और जमानत की मांग की थी। आरोपी की ओर से कहा गया कि याचिकाकर्ता को झूठा फंसाया गया है। मामले में कोई प्रत्यक्षदर्शी साक्ष्य नहीं है और पूरा अभियोजन परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित है। उन्होंने दलील दी कि आरोपी 28 जुलाई 2022 से जेल में है तथा अपील की अंतिम सुनवाई निकट भविष्य में संभव नहीं है, इसलिए सजा निलंबित कर जमानत दी जानी चाहिए।
राज्य की ओर से शासकीय अधिवक्ता ने जमानत का विरोध करते हुए कहा कि आरोपी ने अपने ही ढाई वर्षीय बेटे की हत्या की। मेडिकल रिपोर्ट स्पष्ट रूप से मृत्यु का कारण गला घोंटना बताती है। घटना के समय बच्चा आरोपी की अभिरक्षा में था, इसलिए अप्राकृतिक मृत्यु की परिस्थितियों का स्पष्टीकरण देने का दायित्व भी उसी पर था। मामले की सुनवाई के बाद डिवीजन बेंच ने कहा कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट हत्या की पुष्टि करती है। आरोपी बच्चे की मौत के कारणों को संतोषजनक ढंग से स्पष्ट नहीं कर सका। ऐसे में सजा निलंबन और जमानत देने का कोई मामला नहीं बनता।
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