पटना। ​बिहार की राजनीति में राजधानी पटना का नाम बदलकर पुनः ऐतिहासिक नाम ‘पाटलिपुत्र’ करने की मांग ने जोर पकड़ लिया है। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने हाल ही में इस दिशा में पहल करने का संकेत दिया है, जिसे सांस्कृतिक और ऐतिहासिक गौरव की वापसी के रूप में देखा जा रहा है।

​ऐतिहासिक पहचान की पुनर्स्थापना

​मौर्य साम्राज्य के समय पाटलिपुत्र भारत के राजनीतिक, प्रशासनिक और बौद्धिक केंद्र के रूप में विश्वविख्यात था। राष्ट्रीय लोक मोर्चा (RLM) के अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा ने संसद में तर्क दिया था कि जिस तरह कोलकाता, ओडिशा और मुंबई जैसे शहरों के नाम बदलकर उनकी मूल पहचान वापस लाई गई है, उसी प्रकार पटना का नाम पाटलिपुत्र किया जाना चाहिए। जानकारों का मानना है कि यह बदलाव न केवल इतिहास की धूल साफ करेगा, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को अपने गौरवशाली अतीत से जोड़ेगा।

​नाम बदलने की संवैधानिक प्रक्रिया

​किसी शहर का नाम बदलना एक लंबी प्रशासनिक प्रक्रिया है। पटना के मामले में मुख्य चरण इस प्रकार होंगे:

  • ​राज्य स्तर: राज्य सरकार का प्रस्ताव कैबिनेट में पारित होना चाहिए, जिसके बाद विधानसभा इसे मंजूरी देती है।
  • ​केंद्र की भूमिका: विधानसभा से पारित प्रस्ताव गृह मंत्रालय को भेजा जाता है।
  • ​NOC (अनापत्ति प्रमाण पत्र): केंद्रीय गृह मंत्रालय रेलवे, डाक विभाग और सड़क परिवहन मंत्रालय जैसे संबंधित विभागों से NOC लेता है।
  • ​अधिसूचना: सभी विभागों से सहमति मिलने के बाद आधिकारिक अधिसूचना जारी की जाती है।
  • नोट: राज्य का नाम बदलने की प्रक्रिया अधिक जटिल है और यह संविधान के अनुच्छेद-3 के तहत संसद में बिल पेश करने की मांग करती है।

​कितना होगा खर्च?

​इलाहाबाद का नाम बदलकर प्रयागराज करने के उदाहरण को देखें, तो उस प्रक्रिया में लगभग 300 करोड़ रुपये का खर्च आया था। अनुमान है कि पटना का नाम बदलने पर भी भारी भरकम राशि खर्च हो सकती है। यह व्यय मुख्य रूप से:

  • ​सरकारी दस्तावेजों और स्टेशनरी में बदलाव।
  • ​शहर के सभी सरकारी भवनों और सार्वजनिक स्थानों के साइनबोर्ड बदलना।
  • ​रेलवे स्टेशनों, राजमार्गों और पड़ोसी राज्यों में लगे सूचना पट्टों (Signboards) को अपडेट करना।

​सांस्कृतिक गौरव की आकांक्षा

​पाटलिपुत्र नाम की मांग के पीछे का मुख्य उद्देश्य मगध के गौरवशाली साम्राज्य को सम्मान देना है। अशोक स्तंभ, जो हमारी राष्ट्रीय संप्रभुता काd प्रतीक है, उसी महान साम्राज्य की देन है। वर्ष 2002 में बनी ‘पाटलिपुत्र जागरण अभियान समिति’ के अध्यक्ष डॉ. अनिल सुलभ के अनुसार, पाटलिपुत्र का नाम मगध की समृद्ध विरासत से जुड़ा है। हालांकि, सरकार ने पूर्व में एक लोकसभा सीट और रेलवे स्टेशन का नाम पाटलिपुत्र रखकर इस दिशा में आंशिक पहल की थी, लेकिन अब पूरे शहर के नामकरण की मांग एक जन आंदोलन का रूप लेती दिख रही है।