पटना। बिहार में उच्च शिक्षा को लेकर सियासी और शैक्षणिक पारा अचानक चढ़ गया है। सम्राट सरकार के नए फैसलों के खिलाफ पटना यूनिवर्सिटी (पीयू) के शिक्षक, कर्मचारी और छात्र सड़क पर उतर आए हैं। विश्वविद्यालय की स्वायत्तता बचाने की मांग को लेकर करीब एक हजार लोग पीयू सीनेट हॉल के बाहर एकजुट हुए और जोरदार विरोध प्रदर्शन किया। इस दौरान ‘बिहार सरकार मुर्दाबाद’ के नारे भी लगाए गए। विरोधस्वरूप सभी शिक्षक सामूहिक अवकाश पर हैं।
पुराने एक्ट से छेड़छाड़ और कॉलेजों के अधिग्रहण का विरोध
पटना यूनिवर्सिटी के शिक्षक डॉ. दीप नारायण श्रवण ने विरोध प्रदर्शन के दौरान कहा कि आगामी मानसून सत्र में सरकार ‘बिहार उच्च शिक्षा विधेयक 2026’ पेश करने जा रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि पटना यूनिवर्सिटी के पुराने एक्ट के साथ छेड़छाड़ की जा रही है। यदि पीयू के अंतर्गत आने वाले 10 अंगीभूत (कांस्टीट्यूएंट) कॉलेजों को सीधे सरकार के अधीन लाया गया, तो इस ऐतिहासिक विश्वविद्यालय का अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा। शिक्षकों ने चेतावनी दी कि यदि सरकार ने अपना फैसला वापस नहीं लिया, तो वे विधानसभा घेराव और राजभवन मार्च जैसे बड़े आंदोलन करने को मजबूर होंगे। प्रदर्शन के बीच, परीक्षाएं रद्द होने से नाराज बीएन कॉलेज के छात्रों ने सड़क जाम कर अपना रोष व्यक्त किया।
डीएम-बीडीओ के हाथों में प्रशासनिक फैसले जाना दुर्भाग्यपूर्ण
वाणिज्य महाविद्यालय की प्रिंसिपल सुहेली मेहता ने सरकार के इस कदम की कड़ी आलोचना करते हुए कहा कि यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि अब विश्वविद्यालय और कॉलेजों से जुड़े नीतिगत निर्णय प्रशासनिक अधिकारियों जैसे डीएम और बीडीओ के हाथों में सौंपे जा रहे हैं। इससे विश्वविद्यालयों की शैक्षणिक व्यवस्था पूरी तरह चरमरा जाएगी। उन्होंने बताया कि शिक्षक अपनी आपबीती लेकर उच्च शिक्षा मंत्री संजय सिंह टाइगर से भी मिले थे, लेकिन मंत्री ने इस मामले में कोई खास दिलचस्पी नहीं दिखाई और यह कहकर टाल दिया कि इससे शिक्षकों को क्या परेशानी है। शिक्षकों का मानना है कि बिहार की उच्च शिक्षा का ढांचा देश में सबसे बेहतर है और इसे बिगाड़ने की कोशिश नहीं होनी चाहिए।
राजनीतिक पाबंदियों का आरोप
सहायक प्राध्यापक शेखर ने कहा कि भारतीय लोकतंत्र में विश्वविद्यालयों को हमेशा से स्वायत्त संस्था का दर्जा दिया गया है, ताकि सरकारें अपनी राजनीतिक विचारधारा शैक्षणिक संस्थानों पर न थोप सकें। उन्होंने आशंका जताई कि यदि यूनिवर्सिटी सरकारी तंत्र के अधीन आ गई, तो यहां की निष्पक्षता खत्म हो जाएगी। साथ ही, नए विधेयक में प्रोफेसरों के चुनाव लड़ने, राजनीतिक विचारधारा का प्रचार करने या इसके समर्थन में लिखने पर पूरी तरह रोक लगाने के प्रावधान किए गए हैं, जिसका शिक्षक पुरजोर विरोध कर रहे हैं। शिक्षकों की मांग है कि सरकार अपने इस ड्राफ्ट को सार्वजनिक करे और इस पर खुली चर्चा के बाद ही कोई अंतिम निर्णय ले।
कर्मचारियों का समर्थन और प्रशासनिक बदलाव की रूपरेखा
इस आंदोलन में शिक्षक संघ के साथ-साथ कर्मचारी संघ भी पूरी ताकत से खड़ा है। संघ के महासचिव फरमान अब्बास ने कहा कि कर्मचारी भी सामूहिक अवकाश पर हैं और विश्वविद्यालय मुख्यालय में धरना दे रहे हैं।
दूसरी ओर, मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के नेतृत्व वाली राज्य सरकार का तर्क है कि उच्च शिक्षा में सुधार और प्रशासनिक नियंत्रण के लिए ही यह नया विधेयक लाया जा रहा है। इसके तहत विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता को सीमित करते हुए डिग्री कॉलेजों को सीधे उच्च शिक्षा विभाग के अधीन किया जाएगा। इसके बाद शिक्षकों की नियुक्ति, ट्रांसफर, प्रमोशन और अन्य प्रशासनिक फैसले सीधे विभाग स्तर से ही संचालित किए जाएंगे।


