
घायल शेरनी
सियासत की सांप-सीढ़ी वाले खेल के नियम भी आम हैं। कब 99 के फेर से सीधा नीचे आना पड़े और कब अचानक नई सीढ़ी मिल जाए यह कोई नहीं जानता। अमेठी के रनवे से उड़ान भरने के बाद कुछ वक्त के लिए राजनीतिक रडार से ओझल हुईं स्मृति ईरानी की लैंडिंग छत्तीसगढ़ में हुई है। आलाकमान ने उन्हें प्रदेश प्रभारी बनाकर साफ कर दिया है कि सियासत के रंगमंच में किरदारों का पैक अप नहीं होता, बस किरदार की भूमिका बदल दी जाती है। स्मृति ईरानी की नियुक्ति की स्याही अभी सूखी भी नहीं थी कि सूबे के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने उनका स्वागत घायल शेरनी कहकर किया। बघेल जी ठहरे ठेठ और तजुर्बेकार राजनेता, लेकिन शायद वाइल्डलाइफ का एक बेसिक नियम भूल गए। जंगल में अगर कोई शेरनी सच में घायल हो, तो समझदार लोग चुपचाप रास्ता बदल लेते हैं, उसे पत्थर मारकर उसका मूड चेक नहीं करते! घायल शेरनी को दबोचने की चुपचाप रणनीति बनाते हैं। अब अगर घायल शेरनी दहाड़ेगी, तो खरोंचें तो आनी तय है। खैर बयानों की धुंध को थोड़ा छांटकर देखें, तो इस नियुक्ति में दिल्ली दरबार की एक बेहद सधी हुई पटकथा नजर आती है। पहला एंगल है ‘महतारियों’ का। यह कोई रहस्य नहीं है कि छत्तीसगढ़ में भाजपा की सत्ता में वापसी की असली स्क्रिप्ट महतारी वंदन योजना ने लिखी थी। अब आधी आबादी के उस बंपर वोट बैंक को लॉक रखने के लिए भाजपा को एक ऐसा चेहरा चाहिए था, जिसका सास भी कभी बहू थी.. वाला इमोशनल कनेक्ट हो और जो जरूरत पड़ने पर विपक्ष पर फायर भी कर सके। आलाकमान ने एक पूर्व महिला एवं बाल विकास मंत्री को भेजकर राज्य की महिलाओं को सीधा संदेश दिया है कि राज्य की महतारी की फिक्र अब खुद दिल्ली करेगी। साल 2022 में भी महतारी हुंकार रैली की अगुवाई स्मृति ईऱानी ने ही की थी। दूसरा एंगल है पार्टी का आंतरिक ‘इको-सिस्टम’। सत्ता में वापसी के बाद अक्सर स्थानीय क्षत्रपों की महत्वाकांक्षाएं कुलांचे मारने लगती हैं और गुटबाजी पनपने लगती है। छत्तीसगढ़ में यही हुआ और खूब हुआ। ऐसे में जब दिल्ली से कोई इतना हैवीवेट और तेजतर्रार नेता प्रभारी बनकर ऊपर बैठ जाए, तो राज्य के भीतर पनपने वाली गुटबाजी और फुसफुसाहट पर थोड़ा असर तो पड़ता है। सीधा सा गणित है, प्रभारी की रिपोर्टिंग जब सीधे नंबर 1 और नंबर 2 को होगी, तो अनुशासन की लकीर खुद ब खुद खींचती दिखाई पड़ेगी। बहरहाल बघेल जी के घायल शेरनी वाले बयान ने इस नए सियासी ड्रामे का ट्रेलर तो लॉन्च कर ही दिया है, अब बस देखना यह है कि छत्तीसगढ़ के इस नए सियासी जंगल में दहाड़ किसकी गूंजती है और शिकार कौन बनता है।
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बिसात
भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष होने के नाते नितिन नबीन के पास पूरे देश की कमान है, लेकिन छत्तीसगढ़ की बिसात पर उनके द्वारा बिछाए गए मोहरे बताते हैं कि भले ही उनकी भूमिका बदल गई है, लेकिन राज्य संगठन की जमीनी पकड़ अपने हाथों रखना चाहते हैं। अपने सबसे विश्वस्त सिपहसालार सिद्धार्थ शंभू को सह प्रभारी बनाकर उन्होंने ये जता और बता दिया है कि अग्रिम मोर्चे पर भले ही स्मृति ईरानी जैसी कद्दावर और हाई प्रोफाइल नेत्री की राजनीतिक आभा हो, लेकिन जमीन का अनफिल्टर्ड और रियल टाइम डेटा बिना किसी मध्यस्थ के सीधे उन तक पहुंचता रहेगा। दूसरी ओर संगठन की भीतरी संरचना में भी एक गहरी शल्य क्रिया को अंजाम दिया गया है। पवन साय की विदाई और झारखंड से कर्मवीर सिंह का प्रदेश संगठन महामंत्री के रूप में अवतरण होने के अपने निहितार्थ हैं। राजनीति का यह अकाट्य सिद्धांत है कि जब स्थानीय कलपुर्जे अपनी-अपनी धुन में खड़खड़ाने लगे, तो व्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए एक मैकेनिक की दरकार होती है। कर्मवीर सिंह अपने कठोर और समझौताविहीन सांगठनिक मिजाज के लिए जाने जाते हैं। उनके नियुक्ति से दिल्ली दरबार ने स्थानीय क्षत्रपों को यह अघोषित मगर स्पष्ट फरमान भेज दिया है कि अब लोकल वीटो या क्षत्रप संस्कृति का कोई स्थान नहीं है। गुटबाजी की जो भी टहनी अनुशासन की लक्ष्मण रेखा लांघेगी उसकी निर्मम छंटाई कर दी जाएगी। कर्मवीर साल 2023 में हुए विधानसभा चुनाव के दौरान बस्तर के प्रभारी रह चुके हैं। बस्तर में कैंप कर उन्होंने चुनावी रणनीतियां बुनी और 12 में से 8 सीटों पर जीत का रास्ता तय किया। बहरहाल तमाम चेहरों की नियुक्ति के पीछे का अपना गणित है। सबसे आगे मोर्चे पर स्मृति ईरानी हैं, जिनका राजनीतिक तजुर्बा प्रदेश की ‘महतारियों’ और आम जनता को पार्टी से साधे रखने के काम आएगा। उनके ठीक पीछे सिद्धार्थ शंभू तैनात रहेंगे, जिनका काम होगा बिना फिल्टर के ग्राउंड की सही रिपोर्ट सीधे नीतिन नबीन तक पहुंचाना और इन सबके बीच पर्दे के पीछे रहकर कर्मवीर सिंह चुपचाप अपना सख्त अभियान चलाएंगे, जिसका मकसद पार्टी के भीतर पनप रही गुटबाजी को जड़ से खत्म कर संगठन को चुनावी नजरिए से तैयार करना होगा। इधर प्रदेश के राजनीतिक विमर्श में छत्तीसगढ़िया सबले बढ़िया का नारा भले ही पूरे प्रादेशिक गौरव के साथ गूंज रहा हो, लेकिन यथार्थ यह है कि प्रदेश भाजपा का पूरा ऑपरेटिंग सिस्टम अब एक बाहरी क्लाउड सर्वर पर माइग्रेट हो चुका है। सियासी पिच बेशक छत्तीसगढ़ की मिट्टी पर तैयार की गई है, लेकिन इस बिसात के रिमोट कंट्रोल में लगी बैटरियां बिहार और झारखंड से ऊर्जा ले रही हैं और उनका मास्टर स्विच पूरी तरह से दिल्ली के हाथों में महफूज है।
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राजनीतिक थर्मामीटर
संगठन में अहम फेरबदल के बाद अब सरकार के भीतर बदलाव की सुगबुगाहट भी तेज हो गई है। मंत्रियों के माथे पर पसीने की बूंदे साफ दिखाई पड़ रही है। राजनीतिक थर्मामीटर बता रहा है कि खौफ का तापमान पूरे उफान पर है। दिल्ली वाले ऊंचाई से बैठकर यह देख रहे हैं कि सरकार जमीन पर कैसी दिखाई दे रही है? प्रभारी, सह प्रभारी और संगठन मंत्री की एक साथ हुई नियुक्ति पार्टी हाईकमान के बड़े राजनीतिक एजेंडे की भूमिका तैयार करती दिखाई पड़ती है। सेवा तीर्थ में हुई पीएम मोदी की बैठक से भी यही बात निकलकर बाहर आई कि केंद्रीय नेतृत्व राज्यों की राजनीतिक स्थिति को लेकर अब सामान्य समीक्षा से आगे बढ़कर ठोस फैसले की तैयारी में है। अगर यह सच है, तो राज्य में संगठनात्मक बदलाव को अलग-अलग घटनाक्रम में देखना भी गलत होगा। यह एक बड़ी राजनीतिक पटकथा का पहला दृश्य हो सकता है। पहले संगठन को दुरुस्त करना फिर सरकार के कामकाज का आकलन कर जरूरत के मुताबिक राजनीतिक फैसले लेना। इन्हीं सब वजहों से सत्ता के गलियारों में बेचैनी बढ़ गई है। मंत्रिमंडल से किसकी विदाई होगी? किसका विभाग बदलेगा? किस मंत्री की जिम्मेदारी बढ़ेगी? किस मंत्री की जिम्मेदारी घटेगी? इन तमाम सवालों के जवाब दिल्ली हाईकमान की फाइलों में फिलहाल बंद है। लेकिन दिल्ली के रास्ते जिस तरह से खबरें आ रही है, उसके मुताबिक़ नवरात्रि का पर्व नया इतिहास रच सकता है। लगता है कि राजनीतिक कैलेंडर में यह सामान्य तारीखों के रूप में दर्ज नहीं होगा। लब्बोलुआब यह है कि भाजपा के भीतरखाने में कुछ तो खिचड़ी पक रही है, जिसकी खुशबू अब बाहर हवा में तैर रही है।
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फंड
जंगल का राजा वैसे तो शेर होता है, लेकिन वन विभाग की अपनी एक अलग दुनिया है जहां असली राजा डीएफओ साहब होते हैं और जिस तरह हर राजा का अपना एक गुप्त खजाना होता है, वैसे ही डीएफओ साहब के पास भी एक जादुई खजाना होता है- पी डी फंड। यह वो फंड है, जिसका मुख्यालय से कोई लेना-देना नहीं होता। अब तक मुख्यालय भी आमतौर पर इस खजाने के बारे में पूछने की गुस्ताखी नहीं करता था, लेकिन व्यवस्था के इस जंगल में हमेशा फलों से लदे पेड़ों पर ही सबसे पहले पत्थर उछाले जाते हैं। दरअसल हुआ कुछ यूं कि पखवाड़े भर पहले मंत्री जी की अध्यक्षता में वन विभाग की बैठक चल रही थी। इस बैठक में वन मुख्यालय के आला अफसर और सारे डीएफओ भी मौजूद थे। सब कुछ ठीक चल रहा था कि तभी पी डी फंड नाम का जिन्न बोतल से बाहर निकल आया। पीसीसीएफ महोदय की नजरों ने राडार की तरह काम किया और उन्होंने सीधे डीएफओ साहबान से इस गुप्त खजाने का हिसाब मांग लिया। अब आप ही बताइए जब सामने साक्षात मंत्री और विभाग के सारे दिग्गज बैठे हो तब डीएफओ साहबान अपने इस गुल्लक पर कैसे पर्दा डालते? पी डी फंड कोई साधारण फंड तो है नहीं। यह माइनिंग और औद्योगिक इलाकों का वो कुबेर का खजाना है जो पेड़ों की कुर्बानी से भरता है। नियम है कि कोई भी उद्योग या माइनिंग कंपनी अपनी मर्जी से कुल्हाड़ी नहीं चला सकता है। पेड़ काटने का काम वन विभाग के जिम्मे ही रहता है। इसके ऐवज में प्रति पेड़ की दर से भुगतान स्थानीय स्तर पर डिवीजन के इसी पी डी फंड में जमा किया जाता है। सूबे में पेड़ कटते गए, पैसा आता गया। नतीजा? कई डिवीजनों में ठीक ठाक फंड जमा हो गया। एक औद्योगिक जिले के डिवीजन में तो 30 से 40 करोड़ रुपये पड़ा रखा है। डीएफओ साहब खुश थे कि किसी को कानो-कान खबर नहीं है, लेकिन उस एक मीटिंग ने सारा खेल बिगाड़ दिया। मुख्यालय को कल तक इस फंड की हवा भी नहीं लगती थी, अब वह इस फंड के एक-एक रुपये के खर्च पर बाज जैसी नजर रखेगा। आमतौर पर डीएफओ साहब इस फंड की जानकारी ऐसे छुपाकर रखते थे जैसे नाग अपनी मणि की रक्षा करता है। अब मणि छिन चुकी है। मणि की इस चमक पर किसी और की नजर है। खैर, मालूम चला है कि कई डीएफओ ने इस फंड की तरफ झांकना भी बंद कर दिया है। फंड के खर्च के अपने नियम कायदे हैं और कायदे के बाहर काम कर कोई अपनी कलम नहीं फंसाना चाहता।
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ई-ऑफिस रिजल्ट
मंत्रालय अब पूरी तरह से ई-ऑफिस मोड में आ चुका है। शुरुआत में भले ही कई अधिकारियों और कर्मचारियों ने इस नई व्यवस्था पर नाक भौं सिकोड़ी थी, लेकिन अब नतीजे हैरान करने वाले हैं। ई-ऑफिस के आंकड़े बता रहे हैं कि बाबूगिरी में अटकने वाली फाइलों के निपटारे ने अब रॉकेट की रफ्तार पकड़ ली है। जरा इस महीने के आंकड़े देखिए, महीने भर में करीब 1 लाख 37 हजार फाइलें डिस्पोज हुई हैं और एक फाइल को औसतन सिर्फ 17 घंटे 54 मिनट में निपटाया गया। एक वक्त था जब महीनों तक फाइलें एक टेबल से दूसरी टेबल पर खिसकती नहीं थी। काम की इस रफ्तार में बायोमीट्रिक अटेंडेंस का भी बड़ा हाथ है। समय पर दफ्तर पहुंचने की अनिवार्यता ने गजब के नतीजे दिए हैं। अधिकारी-कर्मचारी अब औसतन 7 घंटे 38 मिनट काम कर रहे हैं, जो एक परफ़ेक्ट वर्किंग टाइम है। वरना एक वक्त यह भी था, जब लोग मनमाने ढंग से मंत्रालय आते-जाते थे। सुबह काम पर आकर एक-दो फाइलें निपटी और चाय पर निकल जाना आम बात थी। चाय से लौटे नहीं कि लंच ब्रेक हो जाता था। लंच ब्रेक के बाद एक-दो फाइलें निपटी और फिर छुट्टी। कम से कम ई-ऑफिस ने लोगों को रिस्पांसिबल बना दिया है।
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