
पॉलिटिकल एसआईपी
सत्ता का ढाई साल बीत जाना किसी भी राज्य की राजनीति में वो हाफ-टाइम है, जहां से ब्यूरोक्रेसी का इन हाउस वेदर स्टेशन हवा का रुख भांपने का काम शुरू कर देता है। सूबे की ब्यूरोक्रेसी में कुछ अफसरों के बीच इन दिनों इस बात का कैलकुलेशन चल रहा है कि अगला पॉलिटिकल सेंसेक्स किस तरफ जाने वाला है। हमारी ब्यूरोक्रेसी शेयर बाजार के सबसे चतुर और घाघ निवेशक की तरह काम कर रही है। वर्तमान सरकार उनके लिए फिक्स्ड डिपॉजिट की तरह है, जो फिलहाल सुरक्षित रिटर्न दे रही है, मगर कई अफसर ऐसे भी हैं, जिन्होंने अपना पॉलिटिकल पोर्टफोलियो को डायवर्सिफाई करना शुरू कर दिया है। ब्यूरोक्रेसी के गलियारे की चर्चा में सुना गया है कि कुछ अफसरों ने पूर्व मुख्यमंत्री के दरबार में चुपके-चुपके अपनी एसआईपी (सिस्टमेटिक इन्वेस्टमेंट प्लान) चालू कर दी है। आखिर रिस्क कौन ले? अगर बाई चांस मौसम बदला और सत्ता का सेंसेक्स पलटा, तो यही एसआईपी अगली बार किसी शानदार विभाग की कुर्सी के रूप में छप्पर फाड़ रिटर्न देगी। खैर, वफादारी साबित करने के बहाने भी एक से बढ़कर एक ईजाद किए जा रहे हैं। चर्चा है कि कुछ अफसर ऐसे हैं, जो गुपचुप तरीके से शिष्टाचार भेंट के नाम पर गुलदस्ता लेकर पहुंच रहे हैं, तो कुछ पुराने दिनों की याद दिलाते हुए कहते हैं कि- सर सच बताऊं तो आपके विजन के बिना काम करने में मजा नहीं आ रहा है। जिन साहबों ने पूर्व सीएम के करीबियों के नंबर ब्लॉक कर दिए थे, वे अब उन्हें फोन कर पूछ रहे हैं, भाई साहब, तबीयत ठीक है ना? एक अफसर ने तो ये तक बताया है कि वर्तमान सरकार की बैठकों में कुछ अफसर सिर ऐसे हिलाते हैं जैसे सारा सिस्टम उन्हीं के कंधों पर टिका है और बाहर निकलते ही व्हाट्सएप कॉल पर पिछले वालों को रिपोर्टिंग कर देते हैं कि सर अंदर सब रायता फैला हुआ है। बहरहाल अगर आजकल कोई अफसर आपको थोड़ा दार्शनिक के साथ थोड़ा कंफ्यूज दिखे, तो समझ जाइए कि उसकी पॉलिटिकल एसआईपी की किस्त अभी-अभी जमा हुई है।
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मुस्कुराइए हम राजधानी में हैं
अगर आपको बिना अंतरिक्ष यान के चांद की सतह पर चलने का रोमांच चाहिए, तो सीधे राजधानी के भाठागांव इलाके का रुख कर लीजिए। यहां कदम रखते ही आपको अहसास होगा कि हमारा शहर आगे नहीं जा रहा, बल्कि पूरे तीस साल पीछे रिवर्स गियर में दौड़ रहा है। विकास की उलांग बांटी खाने वाली राजधानी का इससे जीवंत और झकझोरने वाला उदाहरण और क्या होगा। इस ऐतिहासिक मार्ग को बनाने वाला ठेकेदार भाग गया है। जाते-जाते वह इंजीनियरिंग का एक टू इन वन अजूबा छोड़ गया है। सड़क का एक हिस्सा डामर से सजा है, तो दूसरा हिस्सा बजरी और पाताल भेदी गड्ढों के लिए आरक्षित कर दिया गया है। इसे आप जीवन के सुख-दुख का दार्शनिक मॉडल भी मान सकते हैं। एक तरफ चलिए तो शहर का अहसास, दूसरी तरफ गिरिए तो सीधे पाषाण युग की याद। अब जरा इस ओपन एडवेंचर पार्क से गुजरने वालों की कल्पना कीजिए। स्कूल जाते बच्चों के लिए रोज सुबह यह रास्ता एक मुफ्त का रोलर-कोस्टर है। गर्भवती महिलाओं और दिल के मरीजों के लिए यह ऐसी शॉक थेरेपी है, जो अस्पताल पहुंचने से पहले ही इंसान के शरीर का एक-एक पुर्जा ढीला कर देती है। इधर सड़क को लेकर लोग नाहक ही नगर निगम को कोस रहे हैं कि उसकी आंखों में मोतियाबिंद हो गया है। सच तो यह है कि निगम के अफसरों ने विकास की इस चकाचौंध से बचने के लिए अपनी आंखों पर खुद ही गांधारी की पट्टी बांध ली है और इस बात से बेखबर नगरीय प्रशासन मंत्री अफसरों को जमीन पर उतरने की सलाह दे रहे हैं। रही बात हमारे आदरणीय सांसद और विधायक की, तो वे ठहरे चुनावी मौसम के साइबेरियन पक्षी। जब तक चुनाव का मौसम नहीं आएगा, वे इस उबड़-खाबड़ रनवे पर उतरेंगे ही क्यों? फिलहाल चुनाव दूर है और यहां का आम आदमी इसी विकास के फंदे पर झूलने को अभिशप्त है। इसलिए जब भी इस रास्ते से गुजरे, तो अपनी हिली हुई रीढ़ की हड्डी को सहलाइए और गड्ढे में गिरते हुए पूरे गर्व से कहिए, मुस्कुराइए हम राजधानी में हैं।
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खुरदुरी सच्चाई
राजधानी को छोड़िए पूरे सूबे की सड़कों का हाल बेहाल है। सड़कों के विकास के ये रास्ते इतने उबड़-खाबड़ हैं कि अगर इसरो या नासा चाहे, तो अपने अगले मून-मिशन के रोवर की टेस्टिंग सीधे इन्हीं सड़कों पर कर सकते हैं। करोड़ों रुपये खर्च करके स्पेस में क्यों जाना। जब चांद की सतह वाले विशाल क्रेटर यहां पहले से ही मौजूद हो। खैर, पिछले दिनों की बात है। सड़कों की इस खुरदरी सच्चाई से जब सत्ताधारी दल के एक बड़े नेताजी का सामना हुआ, तो उनका राजनीतिक ब्लड प्रेशर अचानक बढ़ गया और उन्होंने इलाके के मंत्री जी को जमकर धो डाला। आखिर बड़े नेता हैं, उनकी गाड़ी को बिना झटके वाली मखमली सड़क चाहिए थी। अब राजनीति में भी भौतिकी का ऊर्जा संरक्षण का नियम पूरी तरह लागू होता है। गुस्सा न तो पैदा किया जा सकता है, न खत्म किया जा सकता है। यह बस एक पद से दूसरे पद पर ट्रांसफर हो जाता है। सो जब सूबे के एक अन्य मंत्री जी इस चांद की सतह से गुजरे तो हिचकोलों से उनकी रीढ़ की हड्डी के साथ-साथ उनका जमीर भी जाग गया। उन्होंने बीच रास्ते में काफिला रोका और अफसरों को ऐसी फिल्मी फटकार लगाई, मानो उनके तेज आवाज में चिल्लाने भर से गड्ढे अपने आप पट जाएंगे और डामर बिछ जाएगा। सड़क रातों रात चिकनी हो जाएगी। इस पूरे सड़क प्रहसन का सबसे अद्भुत और स्वादिष्ट दृश्य आना अभी बाकी था। संगठन के बड़े नेता से डांट खा चुके एक मंत्री जी सड़क के लिए आंदोलन कर रहे लोगों के बीच जा पहुंचे। आंदोलनकारी मांग रहे थे गिट्टी और डामर, लेकिन हमारे मंत्री जी उन्हें आलू-गुंडा और लड्डू खिला आए। क्या गजब का विजन है मंत्री जी का। यह एक तरह की नई शॉक एब्जॉर्बिंग तकनीक है, जब सिस्टम के पास सड़कों पर बिछाने के लिए कंक्रीट और डामर न हो, तो आंदोलनकारियों के पेट में स्वादिष्ट आलू गुंडा और लड्डू बिछा देना चाहिए। जबान पर मीठा लड्डू रखकर वैसे भी कोई नारे कैसे लगा सकता है? वैसे आंदोलनकारियों को भी अब समझ जाना चाहिए कि चिकनी सड़कों की मांग करना बहुत पुरानी और पिछड़ी हुई सोच है। जब सरकार आपको गड्ढों में मुफ्त ही चांद के दर्शन करवा रही हो, अफसरों की डांट-डपट का लाइव मनोरंजन दे रही हो और विरोध करने पर गर्मागर्म आलू-गुंडे और लड्डू खिला रही हो, तब भला शिकायत कैसी? बस हिचकोले खाइए, लड्डू दबाइए और गड्ढे में गिरते ही पूरी श्रद्धा से कहिए, वाह क्या स्वादिष्ट विकास है।
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सियासी शतरंज
सियासी शतरंज में आम तौर पर काले और सफेद मोहरे एक-दूसरे को काटते हैं, लेकिन छत्तीसगढ़ के प्रभावशाली ‘गुरु’ परिवार ने इस खेल के नियम ही बदल दिए हैं। सरकार में छोटे भाई कैबिनेट मंत्री बनकर सत्ता के सफेद खेमे के वजीर बने बैठे हैं, तो अब बड़े भाई ने विपक्ष के काले खेमे में जाकर हाथी की सवारी कस ली है। इसे कहते हैं सियासत का मास्टरस्ट्रोक। 2028 में ताज चाहे जिस भी पार्टी के सिर सजे, लगता है कि मंत्री के काफिले की गाड़ी इसी परिवार के आंगन में ही पार्क होगी! सत्ताधारी पार्टी से जुड़े एक वरिष्ठ नेता कहते हैं कि पिछले एक दशक का इतिहास गवाह है कि इस परिवार ने प्रदेश में एससी की 10 आरक्षित सीटों को किसी कुशल जादूगर की तरह अपनी उंगलियों पर नचाया है। कभी नई पार्टी बनाकर कांग्रेस का खेल बिगाड़ना, कभी हाथ थाम कर भाजपा का 15 साल का किला ढहाना और फिर कमल पकड़कर वापस सत्ता में लौट आना। अब शायद परिवार को लगा कि हर पांच साल में पूरा बोरिया बिस्तर समेटकर पाला बदलने में खासी थकान होती है, इसलिए समझदारी इसी में है कि दोनों खूंटों से अपनी-अपनी नाव बांध दी जाए। आंधी चाहे जिस दिशा से चले, एक नाव तो किनारे लगेगी ही। यानी चित भी अपनी और पट्ट भी अपना।
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मास्टरशेफ
छत्तीसगढ़ कांग्रेस के सियासी किचन में इन दिनों एक स्पेशल डिश पक रही है। मेन्यू में यूं तो बहुत कुछ हो सकता था, लेकिन फिलहाल कड़ाही में जो खिचड़ी उबल रही है, उसके इकलौते मास्टरशेफ भूपेश बघेल ही नजर आ रहे हैं। दिल्ली आलाकमान भले ही रेसिपी में कुछ बदलाव चाहता हो, लेकिन रायपुर के चूल्हे की आंच पूरी तरह से बघेल के ही कंट्रोल में है। अब खिचड़ी बिना तड़के के तो बेस्वाद है, सो युवा कांग्रेस का चुनाव इस खिचड़ी का बेहतरीन तड़का साबित हो रहा है। तड़का इतना सटीक लगा है कि बघेल गुट का एक प्रत्याशी तो बिना आंच के ही यानी निर्विरोध पककर तैयार हो गया। वहीं अध्यक्ष पद की कुर्सी के लिए चूल्हे की आंच तेज कर दी गई है। सबसे दिलचस्प नजारा किचन के बाहर का है। कांग्रेस के दो सीनियर शेफ यानी बाबा और महंत भले ही किसी और गाड़ी में सवार होकर अपना अलग फूड ब्लाग बनाने निकल गए हो, लेकिन उनके पक्के समर्थक चुपचाप बघेल की किचन में बैठकर सब्जियां काट रहे हैं। आखिर राजनीति में सबको पता होता है कि असली दावत किस टेंट में मिलने वाली है। खिचड़ी का रंग और स्वाद निखारने के लिए इसमें लगातार नए-नए काजू-किशमिश डाले जा रहे हैं। कांग्रेस के एससी प्रकोष्ठ में अध्यक्ष निर्मल कोसरे और कार्यकारी अध्यक्ष के रूप में विधायक चातुरी नंद की नियुक्ति चीख-चीख कर बता रही है कि सारे मसाले बिल्कुल नाप-तौल कर बघेल के ही डिब्बे से निकाले गए हैं। इतना ही नहीं अगर किसी बाहरी व्यक्ति को कांग्रेस के इस किचन का सदस्य बनना हो, तो उसे सीधे बघेल के ही काउंटर से टोकन कटवाना पड़ रहा है। सतनामी समाज के धर्मगुरु बालदास साहब के बेटे गुरु ढाल दास बघेल की एंट्री तो इस खिचड़ी के ऊपर डाले गए शुद्ध देसी घी का काम कर गई है। सुना है कि एक वरिष्ठ मंत्री के रिश्तेदार भी अपनी कटोरी लेकर कतार में खड़े हैं। कुल मिलाकर पंजाब के ढाबे की जिम्मेदारी से मुक्त होने के बाद बघेल पूरी तरह से रायपुर के इस सेंट्रल किचन में रम गए हैं। उनकी पकाई इस खिचड़ी की महक इतनी दमदार है कि उनकी पार्टी वालों की भूख तो बढ़ ही रही है, साथ ही पड़ोस वालों के पेट में भी अजीब सी हलचल शुरू हो गई है।
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उगाही
आजकल सम्मान बाजार में बिकाऊ है। सूबे के एक जिले में कुछ विजनरी आयोजकों ने इस गूढ़ सत्य को गहराई से समझा। उन्होंने तय किया कि महानुभावों के गालों पर सम्मान की लाली मुफ्त में नहीं पोती जाएगी। इसके लिए बाकायदा एक सेल्फ-फाइनेंस्ड सम्मान समारोह की रूपरेखा रची गई। जिनका सम्मान होना था, उन्होंने इसे अपना परम सौभाग्य समझकर श्रद्धा और हैसियत अनुसार थोड़ी-थोड़ी रकम आयोजकों के चरणों में अर्पित कर दी। जिले के कुछ सरकारी विभागों ने भी सोचा कि जब चंदे की गंगा बह ही रही है, तो दो-चार बाल्टी हम भी उड़ेल देते हैं, आखिर आयोजकों की नाराजगी भला कौन मोल ले। वह भी तब जब मुख्य आयोजक इलाके के रसूखदार विधायक हो। आयोजन की तारीख जब एकदम सिर पर आ गई तब एक जादुई परिवर्तन हो गया। रातोंरात इस निजी आयोजन का सरकारीकरण हो गया। आयोजकों ने बड़ी मासूमियत से ऐलान कर दिया कि अब यह आयोजन सरकार कराएगी। सरकार का कार्यक्रम बड़ा भव्य होता है। खूब तामझाम होता है। सरकार जब मंच पर आती है, तब पूरे इलाके के विकास कार्यों का फीता एक साथ कटता है, सो ढेरों लोकार्पण और उद्घाटन के कार्यक्रम तय कर दिए गए। महानुभावों का सम्मान इस आयोजन का केवल पूंछ बनकर रह गया। अब आयोजन तो हो रहा है, लेकिन पशोपेश में वे लोग हैं, जिन्होंने सम्मान पाने के लिए अपना बैंक अकाउंट खाली किया है। वे लोग अब दर्शक दीर्घा की पांचवीं कतार में बैठकर यह सोचेंगे कि जब आयोजन का टेंट, चाय-समोसा और माइक सब सरकार के खर्चे पर है, तो हमारा दिया हुआ चंदा आखिर किस ब्लैक होल में समा गया? क्या वह आयोजकों के निजी उदर-पोषण के लिए जमा हो गया है? लोगों के निशाने पर विधायक हैं और लोग कह रहे हैं कि सम्मान दिलाने की आड़ में इस किस्म की निर्मम उगाही शायद ही किसी विधायक ने की होगी।
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