
चाबुक
जब हाकिम ही हकीम बनने लगे तब हुकूमत को चाबुक चलाना ही पड़ता है। आईएएस-आईपीएस अफसरों के हालिया तबादला आदेश को देखकर लगा कि सरकार को अचानक अपनी साख की फिक्र हो आई है। सरकार ने ऐसे कुछ अफसरों की खबर भी ली है, जो सुशासन के गुब्बारे में छेद कर रहे थे। अफसरशाही पर नकेल कसने के इरादे से ही सही यह कोशिश की जा रही है कि अब हवा भी मंजूरी लेकर ही आर-पार हो। अफसरों के रंगीन मिजाजी के किस्सों से लेकर मेज के नीचे से मिलने वाले उनके हिस्सों तक का हिसाब-किताब सरकार रख रही है। यूं भी रखती थी, लेकिन हाल फिलहाल में सरकार इसे लेकर बेहद सतर्क हो गई है। पावर कॉरिडोर के ख़ास कारिंदे बता रहे हैं कि सरकार अब किसी भी आड़े तिरछे अफसरों को झेलने के मूड में बिल्कुल नहीं है। उच्च पदस्थ अफसरों से सुना है कि तबादला आदेश में एक-दो अफसरों के नाम ऐसे हैं, जिनके चाल चलन पर महीनों तक नजर रखी गई और जब पानी सिर से ऊपर गुजरा तब तबादले की थप्पड़ रसीद कर दी गई। आईपीएस कैडर के तबादले को लेकर भी कुछ इस तरह की ही चर्चा है। एक वरिष्ठ अफसर कहते हैं कि अफसरशाही अगर गलत ट्रैक पर दौड़ेगी तब सुशासन का नारा सिर्फ पोस्टरों में ही अच्छा लगेगा। इस धारणा को बदले जाने के कदम अब आगे बढ़ाए गए हैं। सुशासन का ढोल पीटने वाली सरकार यह समझती दिख रही है कि अगर समय रहते बेलगाम अफसरों पर हंटर नहीं चलाया गया, तो लेने के देने पड़ सकते हैं। इसलिए अब प्यार से समझाने का दौर खत्म हो चुका है। सरकार ने चाबुक निकालकर कहा है कि काम सुधारो या बोरिया बिस्तर बांधो।
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लेकिन…
सरकारी व्यवस्था में अफसरों को लेकर कई तरह की शब्दावली है। ईमानदार अफसर, अव्यावहारिक ईमानदार अफसर, भ्रष्ट अफसर और घोषित रूप से भ्रष्ट अफसर। दरअसल ईमानदार और अव्यावहारिक ईमानदार अफसर के बीच जरा सा फासला है। ईमानदार अफसर को फाइलों में लिखा अक्षर समझ आता है, जहां मामला उनके हितों से टकराव का होता है, वह खुद को अलग कर लेते है। खुद की छवि तो बचा लेते है लेकिन बरसो से चली आ रही परंपरा में बाधक नहीं बनते। अव्यावहारिक ईमानदार अफसर थोड़े अलग होते हैं। उनका बस एक ही फलसफा है कि ना खाऊंगा और ना खाने दूंगा। फाइलों में अड़ंगा लगाना उनका सबसे पसंदीदा काम है। अब रही बात भ्रष्ट और घोषित रूप से भ्रष्ट अफसर की, तो इसे समझना बेहद आसान है। अफसर भ्रष्ट तब तक है, जब तक की उसकी कारगुजारियों की कलई नहीं खुली है और घोषित भ्रष्ट अफसर वह है, जो रंगे हाथों धर लिया गया हो। खैर इतनी बात ये बताने के लिए सरकार एक ओर अफसरों की कारस्तानियों पर चाबुक चलाने बैठ गई है और ठीक उसकी नाक के नीचे एक घोषित भ्रष्ट अफसर की मैदानी तैनाती हो गई है। अफसरों की बैठक में लोग इस तैनाती पर आश्चर्य जता रहे हैं। अब जिस अफसर की तैनाती हुई है, उनकी पहचान इतनी भर है कि उनके माथे पर हर वक्त चिंता की भृकुटि तनी होती है। अफसरशाही में भी लोगों को यह ठीक-ठीक याद नहीं कि आखिरी बार उन्हें कब खिलखिला कर हंसते देखा गया है। इस तैनाती पर कुछ अफसरों की बातचीत के दौरान एक अफसर ने पूछा, खुले मैदान में आकर मवेशी क्या करते हैं? दूसरे अफसर ने जवाब दिया कि चारा चरते हैं। पहले वाले अफसर बोले, इस अफसर और मवेशी के बीच कुछ ऐसा ही संबंध है। वहां मौजूद लोगों को यह बात समझने में थोड़ा वक्त लग गया।
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कतार में
बीते हफ्ते के पहले दिन ही वरिष्ठ आईपीएस अफसरों का तबादला हुआ। जिनके पास काम नहीं था, उन्हें काम पर लगाया गया। इस तबादला आदेश में सरकार ने उन अफसरों को भी काम दिया है, जिनके पास बिल्कुल भी काम नहीं था या कम था। खैर, तबादला आदेश देखकर एकबारगी यह ख्याल आता है कि यह वाकई हैरतअंगेज आदेश हैं। कुछ अफसरों को पहुंचना कहीं था, वह पहुंच कहीं और गए ! इस आदेश में सबसे दिलचस्प बात जो है, वह है सरकार का इशारा। इशारा इस बात का कि अरुण देव गौतम के बाद सूबे का अगला डीजीपी कौन होगा? तबादला आदेश में सरकार ने दो अफसरों के हाथ मजबूत किए हैं। एक हैं प्रदीप गुप्ता और दूसरे हैं विवेकानंद। ऐसे में आईपीएस बिरादरी यह मान रही है कि अगला डीजीपी इन दो अफसरों में से कोई एक बनेगा? हालांकि इस रास्ते के कई और मुसाफिर भी हैं और इन मुसाफिरों को कुर्सी की पहुंच और वहां तक पहुंचने का रास्ता भी मालूम है। कतार में सब लगे है, लेकिन पहुंच कौन पाता है? यह देखना होगा।
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ओहदा
बीते हफ्ते पॉवर सेंटर के इस साप्ताहिक कॉलम में ‘अदालत की चौखट’ शीर्षक से हमने लिखा था कि अदालतें आखिर कैसे बार-बार चीफ सेक्रेटरी, सेक्रेटरी और डीजीपी समेत सरकार के शीर्ष अफसरों को तलब कर रही हैं। अदालतें प्रशासनिक अफसरों की कार्यशैली पर सवाल उठाने का कोई मौका नहीं छोड़ रही हैं। व्यवस्था की बहाली के लिए यह एक हद तक जरूरी भी है, मगर अब बात इससे आगे बढ़कर सीधे ओहदे के टकराव तक पहुंचती दिख रही है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में अदालतों को चलाने वाले जजों और यूपीएससी से चुनकर आए अफसरों की भूमिका भले ही तय हो, लेकिन किसकी भूमिका किससे बड़ी है, यह बहस का एक बड़ा मुद्दा बन गया है। इस पूरी तस्वीर के बरक्स यदि जजों और अफसरों को मिलने वाली सुविधाओं पर नजर डालें, तो दोनों के बीच का अंतर साफ झलकता है। नौकरी में आते ही एक आईएएस-आईपीएस अफसर का वेतन करीब 90 हजार रुपये होता है, जबकि ज्यूडिशियल सर्विस से चुने गए जज का शुरुआती वेतन करीब 1 लाख 23 हजार रुपये होता है। बची हुई छुट्टियों के ऐवज में आईएएस-आईपीएस को किसी तरह का भुगतान नहीं होता, जबकि जजों को हर दो साल में एक महीने की अतिरिक्त सैलरी मिलती है यानी 30 साल की सेवा में करीब 15 महीने का अतिरिक्त वेतन। अफसरों को एलटीसी 4 साल में दो बार दी जाती है, जबकि जजों को यह सुविधा 3 साल में दो बार मिलती है। अफसरों के लिए किसी लोन फैसिलिटी का प्रावधान नहीं है, जबकि जजों को न्यूनतम ब्याज दर पर 10 लाख रुपये तक का लोन मिल सकता है।इतना ही नहीं बिजली-पानी के बिल के लिए अफसरों को किसी भुगतान की सुविधा नहीं मिलती, जबकि जजों का 50 फीसदी तक का भुगतान सरकार करती है। इसके अलावा उच्च शिक्षा भत्ता, प्रशासनिक कार्य के लिए विशेष भत्ता, सत्कार भत्ता, मोबाइल भत्ता, पेंशनर्स को घरेलू कामकाज के लिए नौकर की सुविधा और फर्नीचर भत्ता जैसी ढेरों सुविधाएं जजों के हिस्से आती हैं, जिनसे आईएएस-आईपीएस अफसर पूरी तरह वंचित हैं। रही बात जनता के प्रति सीधे उत्तरदायी होने की, तो आईएएस-आईपीएस अफसरों का मानना है कि मैदान में रहकर निभाई जाने वाली उनकी भूमिका जजों के मुकाबले कहीं ज्यादा मायने रखती है। ऐसे में अफसरों की यह शिकायत है कि जब जिम्मेदारियों का बोझ इतना भारी है, तो जजों के मुकाबले उन्हें भी जायज सुविधाएं क्यों नहीं मिलती?
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असंतोष
भारतीय जनता पार्टी में एक बार फिर साल 2018 जैसा सियासी परिदृश्य उभरता नजर आ रहा है, जहां सत्ता और संगठन के बीच की दूरी खुलकर सामने आने लगी है। हाल ही में हुई दो दिवसीय संगठनात्मक बैठक में कार्यकर्ताओं और निचले स्तर के नेताओं की नाराजगी साफ सुगबुगाती दिखी। शिकायतें सीधे प्रभारी मंत्रियों पर केंद्रित थी कि वे कार्यकर्ताओं को न तो मिलने का वक्त दे रहे हैं और न ही उनकी समस्याएं सुन रहे हैं। इस बेरुखी से नाराज संगठन के एक शीर्ष नेता ने तो एक मंत्री से यहां तक कह दिया कि क्यों न आपकी भूमिका ही बदल दी जाए? यह सुनते ही मंत्री के चेहरे का रंग उड़ गया। यह स्थिति इसलिए बेहद चिंताजनक है क्योंकि भाजपा जैसी कैडर-आधारित पार्टी के लिए कार्यकर्ता उसकी रीढ़, चुनावी मशीनरी का असली इंजन और सरकार तथा जनता के बीच का मुख्य सेतु होता है। यदि यही कार्यकर्ता उपेक्षित महसूस करेगा तो इसका सीधा असर उसकी सक्रियता पर पड़ सकता है। चुनावी नजरिए से देखें तो कार्यकर्ता कभी खुलकर विरोध में वोट नहीं डालता, बल्कि उसकी खामोश निष्क्रियता ही चुनाव हराने के लिए काफी होती है। 2018 में भी भाजपा को सत्ता और संगठन के इसी खिंचाव का खामियाजा भुगतना पड़ा था। मंत्रियों का यह अहंकारी रवैया धरातल पर एंटी-इनकंबेंसी को बढ़ावा देता है, क्योंकि जब वे अपनों की ही नहीं सुन रहे हो तब आम आदमी की पहुंच उनसे और दूर हो जाती है। संगठन द्वारा दिया गया भूमिका बदलने का यह अल्टीमेटम स्पष्ट संकेत देता है कि चुनाव से पहले पार्टी में बड़ा फेरबदल हो सकता है, ताकि कार्यकर्ताओं के भरोसे को समय रहते बहाल किया जा सके।
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आज की कविता
इतने बड़े-बड़े कमरे थे जिनमें सौ सौ लोग समायें
बार-बार जूते खड़काते वर्दीधारी आवैं जायें
घर के भीतर बैठे मंत्री जी दूध मिठाई खायें
बाहर बैठे हुए सबेरे से मिलने वाले जमुहायें
मुंशी आया आगे आगे पीछे मंत्री दर्शन दीन्ह
किया किसी को अनदेखा तो लिया किसी को तुरतै चीन्ह ।
– रघुवीर सहाय
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