Column By- Ashish Tiwari, Resident Editor Contact no : 9425525128

बिश्नोई गैंग और ढेबर

घोटालों के दलदल में फंसे अनवर ढेबर सुर्खियों में आ गए हैं। ढेबर को लॉरेंस बिश्नोई गैंग से खुली धमकी मिली है ! खैर आजकल बिश्नोई गैंग से धमकी को भी लोगों ने स्टेटस सिंबल बना रखा है। आपका स्टेटस इस बात पर तय होने लगा है कि आपको लॉरेंस बिश्नोई गैंग से धमकी मिली है या नहीं? बिश्नोई गैंग में सदस्यता की शर्तें बहुत कड़ी हैं। यहां हर किसी को एंट्री नहीं मिलती। इस क्लब के मौजूदा सदस्यों की सूची देखिए- बॉलीवुड के भाईजान सलमान खान, मिस्टर परफेक्शनिस्ट आमिर खान, इंटरनेशनल बीट्स वाले ए.पी. ढिल्लो, कॉमेडी के सरताज कपिल शर्मा और मुनव्वर फारूकी। राजनीति के गलियारों से पंजाब कांग्रेस के राजा वडिंग, सुखजिंदर रंधावा और बिहार के बाहुबली सांसद पप्पू यादव। मतलब इस सूची में नाम होना इस बात का सर्टिफिकेट है कि आपने जीवन में कुछ ऐसा विलक्षण किया है कि सात समंदर पार बैठा सिंडिकेट भी आपको नोटिस कर रहा है। लोग कह रहे हैं कि इस क्लब में छत्तीसगढ़ से अनवर ढेबर की एंट्री एक तरह की वाइल्ड कार्ड एंट्री है। चर्चा है कि लॉरेंस बिश्नोई गैंग ने ढेबर से 50 करोड़ रुपए की रंगदारी मांगी है। फिलहाल रायपुर पुलिस ने इस मामले में एफआईआर दर्ज कर ली है ! इस एफआईआर की जितनी चर्चा नहीं है, उससे ज्यादा चर्चा अनवर ढेबर को मिले स्टेटस अपग्रेड की है। सोचिए जरा जहां देश के शीर्ष सितारों को धमकियां मिल रही हो, वहां रायपुर के रहने वाले ढेबर सरीखे व्यक्ति से सीधे 50 करोड़ रुपए मांग लेना कोई साधारण बात है? ऐसा लगता है कि बिश्नोई गिरोह के रणनीतिकारों ने अनवर ढेबर की हैसियत का मूल्यांकन बड़ी ही सूक्ष्मता से किया है। शायद ईडी और ईओडब्ल्यू की चार्जशीट को गैंग के चार्टर्ड अकाउंटेंट ने कुछ ज्यादा ही सीरियसली पढ़ लिया होगा और उसी आधार पर 50 करोड़ का बिल फाड़ दिया। कथित तौर पर 50 करोड़ की इस मांग के बाद अनवर ढेबर का ग्राफ विशिष्ट भय सूचकांक में निःसंदेह बहुत ऊपर उठ गया होगा। डर तो सबको लगता है साहब। 

इसे भी पढ़ें : पॉवर सेंटर: पॉलिटिकल एसआईपी… मुस्कुराइए हम राजधानी में हैं… खुरदुरी सच्चाई… सियासी शतरंज… मास्टरशेफ… उगाही… – आशीष तिवारी

इंतजाम अली

निर्माण कार्य करने वाली एक सरकारी एजेंसी के एक इंजीनियर साहब चर्चा के केंद्र में हैं। पिछले 13 सालों से वह अपनी कुर्सी से फेविकोल के मजबूत जोड़ की तरह चिपके हैं। जेई के पद पर डिवीजन में अवतरित हुए थे और अब ईई के ओहदे तक जा पहुंचे हैं। सरकारें आई और गईं, लेकिन मजाल है कि कभी इंजीनियर साहब का तबादला हुआ हो। तबादले के नाम की चिड़िया उनके दफ्तर के ऊपर से उड़ने में भी खौफ खाती है। इंजीनियर साहब डंके की चोट पर पूरे कुनबे में मुनादी करते कहते हैं कि सूबे का बड़े से बड़ा अफसर मेरी जेब में रहता है। उनकी यह जेब कोई सामान्य जेब नहीं है, यह एक किस्म का वीआईपी लाउंज है। इंजीनियर साहब अपनी बिरादरी में अपने रसूख की हेकड़ी भले दिखाते फिरते हो, लेकिन उनके इस रूतबे के पीछे का असली राज उनकी दूसरी उपाधि यानी इंतजाम अली में छिपा है। सच यह है कि इंजीनियर साहब अफसरों को अपनी जेब में नहीं रखते, वह खुद अफसरों की जेब के रुमाल बन जाते हैं। जैसे ही कोई नया आला अफसर कुर्सी पर बैठता है, साहब उसकी चौखट पर तिमारदारी का ऐसा तंबू गाड़ते हैं कि अफसर भी गदगद हो जाता है। इंजीनियर साहब चरण-वंदना को भी प्रोटोकॉल का नाम दे देते हैं। इस अथाह सेवा-भाव के सामने अच्छे-अच्छे अफसर पिघल कर भावविभोर हो जाते हैं। खैर इंजीनियर साहब की असली प्रतिभा केवल अफसरों के प्रबंधन तक सीमित नहीं है। वह आत्मनिर्भरता के सच्चे पुरोधा हैं। उन्हें पता है कि बाहर के लालची ठेकेदारों पर भरोसा करना व्यवस्था के साथ खिलवाड़ करना है। इसलिए उन्होंने खुद ही विभाग का सबसे बड़ा अघोषित ठेकेदार बनने का बीड़ा उठा लिया है। बस सरकारी नियमों की लाज बचाए रखने के लिए पर्दे के पीछे अपने साले साहब और साढू भाई को मैदान में उतार रखा है। काम की रूपरेखा ईई साहब बनाते हैं, टेंडर साले साहब और साढू भाई भरते हैं। फिर बिल पास करने का मुहर इंजीनियर साहब खुद लगा देते हैं। पैसा सरकारी खजाने से निकलता है और एक सुरक्षित पारिवारिक ईको सिस्टम में घूमते हुए सही जगह पहुंच जाता है। इंजीनियर साहब की पूरी दुनिया साले और साढू तक सिमटी हुई है। उनके अपने महकमे में लोग कहते हैं कि इंजीनियर साहब सिस्टम का दीमक नहीं है। वह सिस्टम का सीमेंट हैं। वह भी जंगरोधी। 

इसे भी पढ़ें : पॉवर सेंटर : केदार के नाम रिकॉर्ड… लहर… हे राम… टपकता सच… दुविधा… धर्म सम्राट !… – आशीष तिवारी

लट्ठम-लट्ठा!

छत्तीसगढ़ कांग्रेस के नेताओं के तेवर देखकर ऐसा लग रहा है मानो उन्होंने 2028 का कैलेंडर अभी से अपने कमरे में टांग लिया हो। कल तक पार्टी के भीतर रस्साकशी सिर्फ इस बात को लेकर थी कि प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी किसे मिलेगी, लेकिन अब अचानक 2028 में सीएम कौन? की नई बहस छिड़ गई है। सरगुजा के दौरे पर दीपक बैज ने एक सधा हुआ सियासी दांव चला। उन्होंने बड़ी मासूमियत से खुद को मुख्यमंत्री की रेस से बाहर बताते हुए भूपेश बघेल, डॉ. चरण दास महंत, टीएस सिंहदेव और ताम्रध्वज साहू जैसे दिग्गजों को सीएम पद का संभावित चेहरा बता दिया। लेकिन बैज शायद यह भूल गए कि सरगुजा की जिस राजनीतिक पिच पर वह सियासी शाट लगा रहे थे, उस पिच के असली खिलाड़ी तो बाबा यानी टीएस सिंहदेव ही हैं। सिंहदेव ने बिना देर किए गेंद वापस बैज के पाले में उछाल दी और चुटकी लेते हुए कह दिया- अरे भाई, बैज जी भी तो सीएम पद के दमदार चेहरे हैं। इन बयानों पर तंज कसते हुए कांग्रेस के एक सीनियर नेता ने कहा कि ऊपरी तौर पर यह दीपक बैज का त्याग लग सकता है, लेकिन सियासत की भाषा में इसे औरों को उलझाकर अपनी कुर्सी बचाना कहते हैं। हकीकत तो यह है कि यह पूरा सियासी तमाशा 2028 के मुख्यमंत्री पद के संभावित चेहरे का है ही नहीं, असली जंग तो मौजूदा प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी का है। दीपक बैज यह बखूबी जानते हैं कि अगर चुनाव से पहले संगठन की कमान उनके हाथ से खिसकी, तो 2028 में उनकी कोई पूछ-परख नहीं होगी। इसलिए वे सीनियर नेताओं को भविष्य का ख्वाब दिखाकर वर्तमान में अपनी कुर्सी सुरक्षित कर रहे हैं। वहीं दूसरी तरफ लंबे समय से सीएम पद की बाट जोहते आ रहे बाबा की नजरें भी इसी जुगत में है कि फिलहाल प्रदेश अध्यक्ष की कमान किसी तरह उनके हाथों आ जाए। लब्बोलुआब यह है कि कांग्रेस के भीतर सिर फुटौव्वल इस बात पर मची है कि चुनाव से पहले संगठन का सेनापति कौन होगा? कांग्रेस की स्थिति फिलहाल बिल्कुल वैसी है, जैसी कि यह कहावत-  सूत न कपास, जुलाहों में लट्ठम-लट्ठा!

इसे भी पढ़ें : पॉवर सेंटर : चाबुक… लेकिन… कतार में… ओहदा… असंतोष… – आशीष तिवारी

फैसला ‘कोमा’ में…

सरकारी फैसलों की रफ्तार का अपना एक अलग मिज़ाज है। कभी यह बुलेट ट्रेन सी दौड़ती है, तो कभी बैलगाड़ी से भी धीमी हो जाती है। इस प्रशासनिक विरोधाभास का सबसे सटीक उदाहरण देखना हो तो पीएससी की ओर झांक लीजिए। प्रदेश के लाखों युवाओं के भविष्य की दिशा तय करने वाला सबसे अहम संस्थान इन दिनों बिना कैप्टन के ही सफर पर है। यानी जो आयोग पूरे प्रदेश के लिए योग्य उम्मीदवार चुनता है, सत्ता के गलियारों में उसी के मुखिया के लिए योग्य उम्मीदवार नहीं मिल पा रहा। सरकार ने रीता शांडिल्य को अध्यक्ष का जिम्मा सौंपकर किसी तरह आयोग की गाड़ी को धक्का लगाया था, लेकिन 8 सितंबर को 62 वर्ष की आयु पूरी करने पर नियमानुसार उनका कार्यकाल समाप्त हो गया। तब से लेकर अब तक पीएससी अध्यक्ष की कुर्सी सूनी है। सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जिस सरकार को अपने विज़न के साथ आयोग को नई दिशा देनी थी, वह फिलहाल पूर्ववर्ती सरकार द्वारा नियुक्त किए गए सदस्यों के भरोसे काम चला रही है। ऐसा भी नहीं है कि सत्ता के गलियारों में इसे लेकर कोई हलचल न हुई हो। बीते दिनों मुख्यमंत्री ने नए अध्यक्ष और सदस्यों के नामों को लेकर शीर्ष अफसरों के साथ लंबी माथापच्ची की है, लेकिन इस माथापच्ची के नतीजे अब तक सामने नहीं आ पाए। लगता है माथापच्ची इतनी हुई कि सिस्टम का सिर ही चकरा गया और फैसला कोमा में चला गया। न कोई आदेश निकला और न ही कोई सुध ली गई। कुल मिलाकर जो आयोग युवाओं को नियुक्ति पत्र बांटने के लिए बना था, फिलहाल वो खुद अपने अध्यक्ष की नियुक्ति के इंतजार में खड़ा है।

इसे भी पढ़ें : पॉवर सेंटर : दाम बिना काम नहीं… सरकारी दामाद… दांव पेंच… अदालत की चौखट… मीटिंग प्वाइंट… बेरूखी… – आशीष तिवारी

सरकारी ढांचा !

सरकारी महकमों की ऊंची दीवारों के पीछे इन दिनों कामकाज का एक नया अर्थशास्त्र आकार ले रहा है। बीते दिनों एक आला अफसर के दफ्तर में एक युवा टेक्नोक्रेट लैपटॉप खोले बैठा था। अफसर उसे बड़ी तल्लीनता से समझा रहे थे कि प्रेजेंटेशन में उन्हें क्या-क्या चाहिए और आंकड़े किस तरह पेश किए जाने हैं। कुछ देर बाद काम निपटा और वह युवा दफ्तर से बाहर निकल गया। उसके जाते ही अफसर ने पूछा, जानते हो इस लड़के की सैलरी कितनी है? बिना जवाब का इंतजार किए वे खुद ही बोले, मुझे महीने का ढाई लाख रुपए मिलता है और यह लड़का हर महीने साढ़े तीन से चार लाख रुपए पाता है। मालूम पड़ा कि सरकारी विभागों के काम करने का तौर-तरीका अब भीतर से पूरी तरह बदल चुका है। सच तो यह है कि सरकार का एक बड़ा हिस्सा अब आउटसोर्सिंग पर चल रहा है। विभागों के टेंडर बनाने से लेकर नीतियां ड्राफ्ट करने और प्रेजेंटेशन तैयार करने तक का पूरा जिम्मा अब प्रोजेक्ट मैनेजमेंट यूनिट के कंधों पर है। दरअसल सरकार भी अब व्यावहारिक तौर पर यह मान चुकी है कि जो काम एक प्रोफेशनल टेक्नोक्रेट कर सकता है, वह फाइलों की प्रक्रिया में उलझे बड़े-बड़े अफसरों के बस की बात नहीं है। इसी कमी को पाटने के लिए देश-दुनिया की कई बड़ी कंसल्टेंसी कंपनियां अब सीधे सरकार के लिए काम कर रही हैं।इसके एवज में इन कंपनियों को जो रकम चुकाई जा रही है, उसका गणित भी चौंकाने वाला है। एक विभाग का ही उदाहरण लें, तो वहां प्रोजेक्ट मैनेजमेंट का काम एक निजी कंपनी को सौंपा गया है। उस कंपनी के सिर्फ चार कर्मचारी विभाग के लिए काम करते हैं और इसके बदले में सरकार की तरफ से कंपनी को सालाना 2 करोड़ रुपए का भुगतान किया जाता है। कमोबेश सूबे के हर सरकारी विभाग की कहानी आज यही है। योजनाओं पर मुहर सरकार की लगती है, लेकिन पर्दे के पीछे से योजनाओं का खाका खींचने और व्यवस्था को रफ्तार देने वाला दिमाग कॉरपोरेट कंपनियों का होता है। यह तस्वीर भी दिलचस्प है और इस बात पर सोचने को मजबूर भी करती है कि क्या हमारा अपना पारंपरिक सरकारी ढांचा वक्त के साथ खुद को अपग्रेड करने में पीछे छूट गया है।

इसे भी पढ़ें : पॉवर सेंटर : लाइजनर… सांसद वर्सेस अफसर… कड़वी सच्चाई… साख… जीरो पेंडिंग केस !… वन-विवाद… – आशीष तिवारी

Lalluram.Com के व्हाट्सएप चैनल को Follow करना न भूलें.
https://whatsapp.com/channel/0029Va9ikmL6RGJ8hkYEFC2H