राकेश चतुर्वेदी की कलम से
चार करोड़ का ‘शाही सफरनामा’
सफरनामा विभाग के गलियारों में इन दिनों एक ही चर्चा है। बुकिंग तो होती रही मेहमान घूमते रहे, खाते पीते रहे लेकिन हिसाब-किताब का रास्ता कही और ही मुड़ गया। मामला सामने आए काफी समय बीत गया मगर अब तक न कायमी हुई। न किसी पर विभागीय गाज गिरी। यही वजह है कि दफ्तर में लोग पूछ रहे हैं कि आखिर इतनी बड़ी गड़बड़ी सालों तक किसी की नजर में कैसे नहीं आई। सबसे दिलचस्प चर्चा ऑडिट को लेकर है। हर साल जांच और मिलान होने के बावजूद कथित अनियमितता आखिर पकड़ में क्यों नहीं आई। खबर यह भी है कि विभाग ने रिपोर्ट ख़ाकी को सौंप दी है, ऐसे में फाइलें एक टेबल से दूसरी टेबल तक घूम रही हैं और कार्रवाई अब भी इंतजार में है। सूत्र बताते हैं कि बुकिंग से जुड़ी कुछ और वित्तीय गड़बड़ियों की भी पड़ताल चल रही है। उधर विभाग के शीर्ष अधिकारियों की चुप्पी भी सवालों को और हवा दे रही है। अब सबकी नजर इस बात पर है कि पहले एफआईआर होती है या फिर यह मामला भी सरकारी फाइलों की लंबी यात्रा का हिस्सा बन जाता है। फिलहाल पूरे मामले में कार्रवाई से ज्यादा सवाल और सन्नाटे की चर्चा गर्म है। मामला एक, दो, तीन करोड़ का नहीं बल्कि करीब चार करोड़ का है।
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बिस्तर कहीं और बिल कहीं और…
सफेद कोट वाले महकमे में इन दिनों बेड का खेल खूब चर्चा में है। बेड चले गए लेकिन उनका हिसाब-किताब वही का वही कैसे रह गया। कहानी ऐसी कि कुछ बेड दूसरे अस्पताल पहुंच गए लेकिन कागजों में उनका हिसाब मानो वही का वही ठहरा रह गया। ओर तीन सालों में लाखों रुपयों का भुगतान कर दिया गया। इसी वजह से मेडिकल वेस्ट निस्तारण के नाम पर हुए भुगतान को लेकर सवाल उठने लगे हैं। कुल बेड के 37 प्रतिशत बेड तो एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल में 2023 में ही पहुंच गए लेकिन उनके भुगतान की कहानी दोनों ठिकानों तक चलती रही। अब मामला इलाज करने वाले महकमे तक पहुंच चुका है। विभाग के बड़े साहब ने जांच की बात कही थी। काफी समय बीत गया लेकिन एजेंसी पर कार्रवाई की सुगबुगाहट किसी को नहीं आई। अब चर्चा इस बात की है कि आखिर रिकॉर्ड अपडेट क्यों नहीं हुए और यह सिलसिला इतने समय तक कैसे चलता रहा। कही यह सिर्फ लापरवाही थी या सिस्टम की कोई और कमजोरी इसका जवाब अब तक नहीं मिला।
“जलेबी”… टेढ़ी है पर मीठी है…
दतिया की राजनीति इन दिनों किसी गरमा गरम जलेबी से कम नहीं है। ऊपर से देखने में सीधी लगती है लेकिन जैसे ही एक एक घुमाव खुलता है, नया स्वाद सामने आ जाता है। इस बार का उपचुनाव भी कुछ ऐसा ही है। सबसे बड़ी चर्चा भाजपा के फैसले की है। सालों तक दतिया की राजनीति का बड़ा चेहरा रहे डॉ नरोत्तम मिश्रा का टिकट कट गया और पार्टी ने नया चेहरा आशुतोष तिवारी को मैदान में उतार दिया। अब सवाल यही है कि क्या भाजपा का यह दांव नई मिठास लाता है या फिर जलेबी का यही सबसे टेढ़ा मोड़ साबित होगा? उधर कांग्रेस ने घनश्याम सिंह पर भरोसा जताया है। कांग्रेस को उम्मीद है कि भाजपा के अंदरूनी समीकरण और बदलाव का फायदा उसे मिल सकता है। वहीं आजाद समाज पार्टी से दामोदर यादव भी मैदान में उतरकर मुकाबले को दिलचस्प बनाने की कोशिश कर रहे हैं। भले ही मुकाबला मुख्य रूप से भाजपा और कांग्रेस के बीच माना जा रहा हो लेकिन तीसरे उम्मीदवार की मौजूदगी वोटों के गणित को बदल सकती है। अब बात जनता की करे तो दतिया की जनता इस बार सिर्फ भाषण नहीं सुनना चाहती। लोगों के बीच चर्चा है कि सड़क, रोजगार, पानी, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे मुद्दों पर इस बार नेता कितने गंभीर हैं, चुनावी मंचों पर वादों की मिठास खूब परोसी जा रही है लेकिन जनता पूछ रही है कि आखिर चुनाव के बाद इस मिठास का स्वाद कितने दिन तक रहेगा? चाय की दुकानों से लेकर चौपालों तक एक ही चर्चा है इस बार वोट चेहरे पर पड़ेगा या काम पर? कुल मिलाकर दतिया का यह उपचुनाव जलेबी की तरह टेढ़ा जरूर है लेकिन फैसला जनता के हाथ में है। अब देखना दिलचस्प होगा कि चुनावी जलेबी आखिर किसके हिस्से की सबसे मीठी साबित होती है और किस उम्मीदवार के लिए इसके टेढ़े घुमाव सबसे बड़ी चुनौती बन जाते हैं। क्योंकि आखिर में जनता का एक वोट ही तय करेगा कि जीत की मिठास किसके हिस्से आएगी।
कांग्रेस की ‘गुप्त’ नियुक्ति
दतिया उपचुनाव में जीत हासिल करने के लिए बीजेपी कांग्रेस सियासी जमावट में जुटी हुई है। दोनों पार्टियों के अंदर चुनाव के शुरुआती समय में नाराजगी भी देखी गई, खुलकर बगावत भी हुई, अब धीरे-धीरे ऊपरी तौर पर सब ठीक भी हो गया। इन सबके बीच मध्यप्रदेश कांग्रेस ने एक नाराज नेता को मनाने के लिए पद से नवाजा है नियुक्ति का लेटर 30 जुलाई तक गुप्त रखने के लिए कहां गया है, कांग्रेस इस बात से चिंतित है अगर नियुक्ति का राज खुल गया तो दूसरे नेता भी पद की मांग कर देंगे मामला शांत होने की जगह और बढ़ा सकता है इसलिए लेटर को सार्वजनिक नहीं करने के निर्देश दिए गए हैं। बताते चलें नेताजी को प्रदेश महासचिव बनाया गया है।
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सियासत में ‘फूफा’ की एंट्री!
इंदौर में हुए एक भव्य स्वागत कार्यक्रम ने सियासी गलियारों में ऐसी हलचल मचा दी है कि अब कार्यक्रम से ज्यादा चर्चा उसमें हुई नाराजगी और तानों की हो रही है। जिला प्रशासन की ओर से आयोजित स्वागत कार्यक्रम के बाद भाजपा के भीतर की खींचतान खुलकर सामने आती दिखाई दी। अब राजनीतिक गलियारों में एक नेता को नए नाम “फूफा” से पुकारे जाने की चर्चा तेज है। बताया जा रहा है कि एक नेता को कार्यक्रम की जानकारी नहीं थी। उनकी नाराजगी इस बात को लेकर थी कि उन्हें कार्यक्रम की जानकारी ही नहीं दी गई। नाराज नेता ने साफ शब्दों में कहा कि यदि उन्हें पहले से सूचना मिल जाती तो वे सैकड़ों नहीं बल्कि हजारों कार्यकर्ताओं के साथ माहौल ही बदल देते। इसी बीच जब दूसरे नेता मौके पर पहुंचे तो नाराज नेता ने तंज कसते हुए कहा कि आपने तो पूरा कार्यक्रम करवा दिया, हमें तो इसकी भनक तक नहीं लगने दी। इस ताने के बाद माहौल कुछ देर के लिए असहज भी हो गया। जवाब में दूसरे नेता ने तुरंत जिम्मेदारी जिला प्रशासन पर डालते हुए कहा कि यह कार्यक्रम उनका नहीं बल्कि जिला प्रशासन का था। लेकिन राजनीतिक चर्चाओं का बाजार इसलिए और गर्म हो गया क्योंकि कार्यक्रम में उन्हीं नेता के कई समर्थक मौजूद दिखाई दिए। ऐसे में सवाल उठने लगे कि अगर कार्यक्रम पूरी तरह प्रशासन का था तो फिर राजनीतिक मौजूदगी इतनी मजबूत कैसे रही? अब इस पूरे घटनाक्रम के बाद भाजपा के अंदर ही अंदर चुटकुले, तंज और फुसफुसाहटों का दौर शुरू हो गया है। राजनीतिक गलियारों में संबंधित नेता को नया नाम “फूफा” दिया जा रहा है और यही नाम अब सबसे ज्यादा चर्चा का विषय बना हुआ है।
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