राकेश चतर्वेदी की कलम से
जज को आईएएस समझ बैठे नेताजी, फिट उल्टे पांव लौटना पड़ा
खनन के लिए पहचाने जाने वाले इलाके के दमदार नेताजी ने कमाल ही कर दिया. मंशा अनुरूप काम नहीं होने से नाराज नेताजी ऐसे विभाग में दबंगई के साथ घुस गए, जहां जज डेपुटेशन पर आ जाते हैं. नेताजी ने जिस दबंगई के साथ कार्यालय में प्रवेश किया, उसी तेस के साथ दरवाजा खोलकर अंदर घुस गए और कुर्सी पर बैठे अधिकारी के सामने टेबल पर जोर से फाइल पटक मारी. अफसर ने पहले तो नेताजी को कैबिन से बाहर भेजा और फिर चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी के जरिए संदेशा पहुंचाया कि अफसर को आप आईएएस समझ रहे होंगे, लेकिन वो आईएएस नहीं जज हैं. इतना बोलने के बाद कर्मचारी ने साइड में बैठने और मिलने के लिए पर्ची भेजने का कह दिया. नेताजी कुछ देर कुर्सी पर बैठे और फिर दाल गलती न देख वहां से चलते बने. कहानी ये भी है कि नेताजी ने जो फाइल पटकी थी, अब वो फाइल दफ्तर में है ही नहीं.
जांच एजेंसी के पास धूल खा रही भू-माफिया विधायक के कारनामों की फाइल
भोपाल संभाग के एक सत्ताधारी विधायक के जमीन संबंधी मामले अब ज्यादा छुपे नहीं बचे हैं. इसका कारण विधायक के कारनामों की फाइल एक जांच एजेंसी के कार्यालय में जमा होना है. शिकायत की फेहरिस्त तो लंबी-चौड़ी है, लेकिन चर्चा है कि जांच और कार्रवाई के बजाय फाइल को धूल खूब खा रही है. शिकायत जमा होते समय तो साहब ने दूध का दूध और पानी का पानी कर कड़ी कार्रवाई करने का आश्वासन दिया था लेकिन अब कार्रवाई ही दूध और पानी एक करने के समान होती दिखाई दे रही है. चर्चा यह भी है कि किसी से मिलीभगत कर विधायकजी ने शिकायतकर्ता तक भी अपनी बात पहुंचाने में सफलता हासिल कर ली है. शायद यही कारण है कि कुछ दिन से फाइल के संबंध में खोजखबर करने वाले भी नजर नहीं आ रहे हैं.
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निगम में साहब के जलवे, एमडी भी रह गए हैरान
मध्य प्रदेश के खाने पीने बनाने वाले विभाग में इन दिनों एक अधिकारी के जलवों की खूब चर्चा है. कहा जा रहा है कि साहब का रुतबा ऐसा है कि कई बार वे खुद को प्रबंधन से भी ऊपर समझने लगते हैं. चर्चा है कि जब निगम के प्रबंध संचालक जम्मू-कश्मीर में चुनावी ड्यूटी पर गए थे, तब उनके लौटने का इंतजार किए बिना ही साहब ने खुद को महाप्रबंधक जैसी भूमिका में स्थापित कर लिया. इतना ही नहीं प्रशासनिक जिम्मेदारियों में भी फेरबदल कर एक आईटी अधिकारी को प्रशासनिक अधिकारी की जिम्मेदारी सौंप दी. बताया जाता है कि एमडी के लौटने पर जब पूरे घटनाक्रम की जानकारी मिली तो वे खासे नाराज हुए और तत्काल साहब से सभी अतिरिक्त जिम्मेदारियां वापस ले लीं. हालांकि यह नाराजगी ज्यादा दिन नहीं चली. कुछ ही समय बाद साहब को फिर से निगम की अहम कमाई वाली शाखा की कमान सौंप दी गई. इसके बाद दफ्तर के गलियारों में फिर वही सवाल गूंजने लगा आखिर साहब का रसूख कितना मजबूत है. चर्चा सिर्फ यही तक सीमित नहीं है, निगम के गलियारों में यह भी कहा जा रहा है कि साहब ने अपने बेटे को आउटसोर्स व्यवस्था के तहत नियुक्त कराया. इतना ही नहीं महज एक साल के भीतर उसकी सैलरी भी दोगुने से अधिक बढ़वा दी गई, जहां अधिकांश आउटसोर्स कर्मचारियों को सामान्य सुविधाएं भी मुश्किल से मिलती है, वहीं साहब के बेटे को वाहन जैसी सुविधा भी उपलब्ध करा दी गई.
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गॉशिप
सैर सपाटे वाले विभाग में होटल मैनेजमेंट संबंधित कई कोर्स के लिए खुला एक कॉलेज इन दिनों खूब चर्चाओं में है. हैरानी की बात यह है कि कॉलेज में डायरेक्टर हैं, पूरा स्टाफ है, दफ्तर भी चल रहा है, लेकिन कई सालों से यहां एक भी छात्र नहीं है. इसके बावजूद हर महीने लाखों रुपये वेतन और अन्य मदों में खर्च किए जा रहे हैं. अब गलियारों में सवाल गूंज रहा है कि आखिर बिना विद्यार्थियों वाले इस भूतिया कॉलेज को आखिर किस मजबूरी में जिंदा रखा गया है. क्या यह सिर्फ फाइलों में चलने वाली संस्था बनकर रह गई है, या फिर इसके पीछे कोई और कहानी है. चर्चा तो यह भी है कि जिम्मेदारों को इस रहस्य से पर्दा उठाना चाहिए.
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