राकेश चतुर्वेदी की कलम से
प्रेशर के लिए ध्यानाकर्षण का शतक
एक विधानसभा क्षेत्र में जनता से जुड़ी कितनी समस्याएं होंगी, जवाब दो, पांच, दस से बढ़कर अधिकतम 15-20 के आंकड़े पर तो सिमट ही जाएगा. लेकिन कांग्रेस सहित भाजपा में रह चुके एक विधायकजी के क्षेत्र में चार-छह दर्जन नहीं बल्कि एक सैकड़ा से अधिक जटिल समस्याएं बनी हुई हैं. अब उनके निदान के लिए विधायकजी ने अजीब तरकीब सोचते हुए सीधे विधानसभा की शरण ली है. तरकीब ऐसी कि समस्याओं के समाधान के लिए विधानसभा में सवाल नहीं लगाए गए बल्कि सीधे ध्यानाकर्षण की सूचनाएं भेजी गई है. 20 जुलाई से शुरू होने जा रहे विधानसभा के मानसून सत्र के लिए विधायकजी ने ध्यानाकर्षण की पूरी 100 सूचनाएं भेजी हैं. ये खबर लीक तब हुई जब विधायकजी के ध्यानाकर्षण से विधानसभा के अधिकारी सकते में आए और ध्यानाकर्षण की सूचनाओं का आंकड़ा कुछ कम करने का माननीय से आग्रह किया, लेकिन विधायकजी ने किसी की भी एक न सुनी. गॉसिप वाली बात ये है कि नेताजी ये तो मानकर चल रहे हैं कि जिन मामलों को उन्होंने ध्यानाकर्षण के जरिए विधानसभा तक पहुंचाया है, उन सब पर सदन में संबंधित मंत्रियों का ध्यान तो आकर्षित नहीं करवा पाएंगे, लेकिन मामले विधानसभा की दहलीज तक पहुंचाकर सत्र के बीच विंध्य क्षेत्र की इस विधानसभा को चर्चा में जरूर ले आएंगे.
चेयरमैन ने बिना बताए वापस बुलवा ली मंत्री के बंगले में अटैच गाड़ी
मध्य प्रदेश में वैसे तो मंत्रियों के पास सरकारी वाहनों का कोई टोटा नहीं रहता. ऊपर से मंत्रियों को जब विभाग से संबंधित निगम-मंडलों की भी अधिकृत रूप से जिम्मेदारी मिली थी तो वाहन संबंधी सुख-सुविधा का जमकर दुरुपयोग किया. दरअसल, कुछ मंत्रियों ने निगम-मंडलों के खातों के लग्जरी वाहन भी अपने बंगलों पर अटैच करवा लिए थे. तब से ही इन वाहनों का उपयोग बंगलों की सेवा में सतत जारी था. अब कुछ समय पहले निगम-मंडलों में अध्यक्ष-उपाध्यक्ष-सदस्यों की नियुक्ति हुई, तब भी विभागीय मंत्रियों के बंगलों पर अवैध वाहन अटैच का सिलसिला जारी रहा. कामकाज संभालने के बाद एक निगम के चेयरमैन ने लेखा-जोखा देखा तो वाहन अटैच होने का मामला पकड़ में आने में देन न लगी. फिर क्या था चेयरमैन साहब ने आव देखा न ताव मंत्रीजी को सूचना दिए बगैर ही अटैच वाहन बंगले से वापस बुलवा लिया और अफसरों को आगे से इस तरह फिजूलखर्ची से बचने के लिए ताकीद भी कर दिया. बड़ी बात ये रही कि बंगले में अटैच वाहन हटने की जानकारी मंत्रीजी को ही दूसरे दिन लगी. सुनने में आ रहा है कि इस घटना से आहत मंत्रीजी ने निगम की फाइलों पर नजर गढ़ाई तो चेयरमैन साहब ने भी मंत्रीजी के विभाग की खोजखबर करना शुरू कर दिया है. माना जा रहा है इस तनातनी के बीच अब चाहे मंडल से निकले या विभाग से आने वाले समय में गॉसिप से निकलती ही रहेंगी.
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लंच ब्रेक वाले मंत्रालयीन बड़े साहब
मध्य प्रदेश मंत्रालय के एक विभाग के बड़े साहब का लंच ब्रेक काफी चर्चा में आ गया है. विभाग के कर्मचारी तो उन्हें अब लंच ब्रेक वाले साहब कहने लगे हैं. कारण भी सीधा है मंत्रालय में उपस्थिति कार्यालयीन लंच ब्रेक से तय होती है. लंच ब्रेक उपस्थिति यानी साहब अपने कार्यालय में या तो मंत्रालय लंच ब्रेक के पहले तक ही उपस्थित रहेंगे या फिर इसके बाद आमद दर्ज करवाएंगे. साहब अपनी डयूटी टाइम को लेकर इतने अधिक पाबंद हैं कि सुबह घड़ी का कांटा 11.10 पर आते ही पूरा स्टॉफ समझ जाता है कि आज के कामकाज का वक्त कब निर्धारित रहेगा. फिर चाहे लेंडलाइन पर ऑफिशियल कॉल आए या मिलने-जुलने वाले या फिर विभागीय मीटिंग का समय तय करना हो. स्टॉफ खुद ही तय कर देता है कि अब आगे क्या और कब करना है. पाठकों के लिए बता दें कि साहब ने ऑफिस आने का समय सुबह 11 बजे का तय कर रखा है. 11.10 से पहले उपस्थिति दर्ज करा दी तो साहब लंच ब्रेक होते ही मंत्रालय से अंतर्धयान हो जाएंगे और इस गाइडलाइन तक नहीं पहुंचे तो फिर लंच ब्रेक के बाद ही उनका शुभआगमन होगा. खबर ये भी है कि समकक्ष अफसरों ने ही वीक एंड के दिन साहब का ब्रेक टाइम सबसे बड़े साहब को अपडेट कर दिया है.
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पानी वाले विभाग में जहां पानी से ज्यादा इन दोनों चर्चाओं का बहाव तेज है. इन दिनों विभाग के गलियारों में एक साहब की बड़ी चर्चा है. कहते हैं जनाब के पास एक नहीं, पूरे तीन-तीन दफ्तरों की चाबी है, लेकिन साहब खुद किस दफ्तर में मिलेंगे, यह किसी पहेली से कम नहीं है. दिलचस्प बात यह है कि जहां साहब नहीं पहुंचते वहां भी पंखे पूरे जोश में घूमते है. ट्यूबलाइटें पूरी शान से चमकती है और AC ऐसे चलता है मानो साहब अभी-अभी कुर्सी छोड़कर निकले हो. चर्चा है कि महीनों से यही नजारा बना हुआ है. अब सवाल यह है कि बिजली का मीटर सरकारी खजाने पर दौड़ रहा है या फिर कोई अदृश्य ड्यूटी निभाई जा रही है. गलियारों में कानाफूसी है कि साहब से ज्यादा उनकी खाली कुर्सी और चलता AC चर्चा का विषय बने हुए हैं. विभाग के गलियारों में चर्चा है कि सहाब का रुतबा इतना है कि उनके बिना भी दफ्तर की बिजली ड्यूटी पर रहती है.
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