सतीश सिंह, लखनऊ. उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 (UP Assembly Elections 2027) की तैयारियां राजनीतिक दलों के स्तर पर तेज होती दिख रही हैं. भारतीय जनता पार्टी जहां लगातार हिंदुत्व, राष्ट्रवाद और विकास के मुद्दों पर अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने में जुटी है, वहीं समाजवादी पार्टी भी अपने पारंपरिक पीडीए (पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक) समीकरण के साथ अब सनातन और हिंदू आस्था से जुड़े प्रतीकों को लेकर पहले से ज्यादा सक्रिय नजर आ रही है. ऐसे में राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि क्या सपा भी अब प्रतीकों की राजनीति के जरिए अपने जनाधार का विस्तार करना चाहती है.
लंबे समय तक समाजवादी पार्टी पर भाजपा की ओर से मुस्लिम तुष्टिकरण के आरोप लगाए जाते रहे हैं. कब्रिस्तान की बाउंड्रीवाल, एक विशेष वर्ग की राजनीति और तुष्टिकरण जैसे मुद्दे चुनावी मंचों पर भाजपा लगातार उठाती रही है. ऐसे आरोपों के बीच सपा के हालिया कदमों को पार्टी की बदली हुई चुनावी रणनीति के रूप में देखा जा रहा है.
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समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा था कि “मैं कोई भी काम पंडित जी से पूछकर करता हूं” इस बयान के बाद उनके जन्मदिन पर मैनपुरी से सांसद और उनकी पत्नी डिंपल यादव ने वाराणसी पहुंचकर काशी विश्वनाथ मंदिर में दर्शन-पूजन किया. इसके अलावा हाल ही में अखिलेश यादव ने सांसद निधि से कन्नौज के 16 मंदिरों में सोलर लाइट लगाने के लिए जिलाधिकारी को पत्र भी लिखा है.
यहीं नहीं, अयोध्या में राम मंदिर के चढ़ावे में कथित अनियमितताओं का मुद्दा भी समाजवादी पार्टी लगातार उठा रही है. पार्टी नेताओं का कहना है कि यह करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का विषय है और इसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए. इटावा में केदारेश्वर महादेव मंदिर का निर्माण भी सपा के धार्मिक-सांस्कृतिक जुड़ाव के उदाहरण के रूप में देखा जाता है.
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राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह घटनाक्रम केवल धार्मिक आस्था का प्रदर्शन नहीं, बल्कि एक व्यापक राजनीतिक संदेश भी हो सकता है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के राजनीतिक अभियान में धार्मिक और सांस्कृतिक प्रतीकों का प्रयोग लंबे समय से एक महत्वपूर्ण रणनीति माना जाता रहा है. काशी विश्वनाथ धाम, अयोध्या में राम मंदिर, महाकाल लोक और केदारनाथ जैसे स्थलों से जुड़ी उनकी सक्रियता को भाजपा की सांस्कृतिक राजनीति का हिस्सा माना जाता है. ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या समाजवादी पार्टी भी अब पीडीए के सामाजिक समीकरण के साथ हिंदू मतदाताओं को यह संदेश देना चाहती है कि वह सनातन विरोधी नहीं, बल्कि आस्था और धार्मिक परंपराओं का सम्मान करने वाली पार्टी है.
हालांकि, राजनीतिक विश्लेषण और चुनावी रणनीति के दावों से अलग, समाजवादी पार्टी की ओर से आधिकारिक रूप से यह नहीं कहा गया है कि उसने अपनी वैचारिक दिशा बदली है. पार्टी अब भी सामाजिक न्याय, संविधान, आरक्षण और पीडीए की राजनीति को अपनी प्राथमिकता बताती है. वहीं भाजपा का आरोप है कि सपा का यह बदला हुआ रुख चुनावी मजबूरी का परिणाम है. 2027 के विधानसभा चुनाव में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या पीडीए के साथ सनातन का यह संतुलन समाजवादी पार्टी के लिए नए वोटों का रास्ता खोलता है या फिर मतदाता इसे केवल चुनावी रणनीति के रूप में देखते हैं.

