चंडीगढ़। पंजाब की भगवंत मान सरकार ने स्कूल शिक्षा विभाग में पदोन्नति (प्रमोशन) की व्यवस्था में बड़ा बदलाव किया है। अब राज्य में डिप्टी डीईओ, प्रिंसिपल और हेडमास्टर जैसे प्रबंधकीय पदों पर बैठने के लिए केवल अनुभव या वरिष्ठता काफी नहीं होगी, बल्कि शिक्षकों को विभागीय परीक्षा पास करनी होगी। सरकार के इस फैसले ने शिक्षा विभाग में हलचल मचा दी है।
मेरिट से तय होगी कुर्सी
नई नीति के तहत अधिकारियों को अपनी योग्यता साबित करने के लिए 3 साल के भीतर कुल 4 अवसर दिए जाएंगे। यदि कोई शिक्षक इन प्रयासों में परीक्षा पास करने में असफल रहता है, तो उसके लिए पदोन्नति के रास्ते बंद हो जाएंगे। सरकार का तर्क है कि इस कदम से शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता आएगी और ‘मेरिट’ के आधार पर नियुक्तियां होंगी।
चयन प्रक्रिया और अंक निर्धारण
पदोन्नति के लिए चयन प्रक्रिया दो चरणों में पूरी होगी: लिखित परीक्षा और साक्षात्कार (इंटरव्यू)। सामान्य वर्ग: लिखित परीक्षा में न्यूनतम 45% अंक अनिवार्य। आरक्षित वर्ग: न्यूनतम 40% अंक लाना जरूरी। दोनों चरणों के संयुक्त अंकों के आधार पर अंतिम मेरिट सूची तैयार की जाएगी। 3 साल या 4 प्रयासों में परीक्षा पास न करने पर पंजाब सिविल सेवा नियम 1994 के तहत कार्रवाई की जाएगी।

अनुभव की शर्तों में राहत, योग्यता में सख्ती
सरकार ने अनुभव संबंधी नियमों में कुछ ढील दी है ताकि युवा शिक्षकों को मौका मिल सके। लेक्चरर: अनुभव 7 साल से घटाकर 5 साल किया गया। प्रिंसिपल: अनुभव 5 साल से घटाकर 4 साल किया गया। योग्यता: अब प्रिंसिपल पद के लिए पोस्ट ग्रेजुएशन (PG) में सामान्य वर्ग हेतु 50% और एससी वर्ग हेतु 45% अंक अनिवार्य होंगे।
शिक्षक संगठनों ने खोला मोर्चा
इस फैसले का विरोध भी शुरू हो गया है। शिक्षक संगठनों का कहना है कि सरकार पदोन्नति के रास्ते में अड़चनें पैदा कर रही है। हालांकि, सरकार ने प्रिंसिपल पद पर पदोन्नति का कोटा 50% से बढ़ाकर 75% कर दिया है, जबकि शेष 25% पदों पर सीधी भर्ती की जाएगी। डीटीएफ के सूबा प्रधान विक्रमदेव सिंह ने इस नीति का कड़ा विरोध करने की चेतावनी दी है।
क्या होगा असर?
शिक्षा विभाग के सूत्रों का मानना है कि इस बदलाव से स्कूलों के प्रशासनिक ढांचे में पेशेवर दृष्टिकोण आएगा। वरिष्ठता के एकाधिकार को खत्म कर प्रतिस्पर्धात्मक माहौल तैयार करना ही इस नीति का मुख्य उद्देश्य है।
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