चंडीगढ़। पंजाब में स्थानीय निकाय चुनावों को ईवीएम की बजाय बैलेट पेपर को लेकर अब बहस छिड़ गई है. बैलेट पेपर का उपयोग करने के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट में मंगलवार को तीखी बहस हुई. इस बहस में तरह तरह के तर्क वितर्क हुए, जिसमें प्रमुख सवाल उठा कि जब राज्य चुनाव आयोग वर्षों से इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन का इस्तेमाल करता आ रहा था तो अब अचानक पारंपरिक बैलेट पेपर प्रणाली पर लौटने का औचित्य क्या है.
ईवीएम प्रणाली को कानूनी वैधता मिली थी
चुनाव प्रक्रिया को बैलेट पेपर प्रणाली में वापस ले जाने की मांग पर उन्होंने दलील दी कि सुप्रीम कोर्ट पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि चुनाव प्रक्रिया को बैलेट पेपर प्रणाली में वापस ले जाने की मांग “अस्वीकार्य और अव्यवहारिक” है.वरिष्ठ वकील ने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि ईवीएम प्रणाली को कानूनी वैधता वर्ष 2002 में ही मिल चुकी थी और उसके बाद लगातार अदालतों ने इसे बरकरार रखा है.
बहस के दौरान अदालत के समक्ष यह भी रखा गया कि वर्ष 1984 में पहली बार ईवीएम के प्रयोग का प्रयास हुआ था, लेकिन उस समय वैधानिक प्रावधान नहीं होने के कारण उसे निरस्त कर दिया गया. बाद में संसद ने जनप्रतिनिधित्व अधिनियम में धारा 61-ए जोड़ी और राज्यों ने भी अपने कानूनों में समान प्रावधान शामिल किए.

ईवीएम प्रणाली में अवैध वोट की संभावना खत्म
वरिष्ठ अधिवक्ता ने सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले का विशेष उल्लेख किया जिसमें कहा गया था कि ईवीएम प्रणाली में अवैध वोट की संभावना समाप्त हो जाती है, मतगणना तेज होती है और बूथ कैप्चरिंग तथा धांधली की आशंकाएं कम होती हैं. अदालत को बताया गया कि शीर्ष अदालत ने अपने फैसले में यह भी कहा था कि बैलेट पेपर प्रणाली की कमजोरियां सर्वविदित हैं और चुनावी पारदर्शिता के लिए ईवीएम अधिक प्रभावी माध्यम है.
चुनाव आयोग से कोर्ट ने मांगा रिकॉर्ड
सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने राज्य चुनाव आयोग से पूछा कि यदि ईवीएम उपलब्ध नहीं थीं तो उसका रिकॉर्ड और पत्राचार अदालत के समक्ष रखा जाए. इस पर राज्य चुनाव आयोग की ओर से कहा गया कि भारत निर्वाचन आयोग को ईवीएम उपलब्ध कराने के लिए पत्र लिखा गया था, लेकिन मशीनें अन्य राज्यों में भेजी जा चुकी थीं और तत्काल उपलब्ध नहीं थीं. आयोग ने कहा कि आंध्र प्रदेश समेत अन्य स्थानों से मशीनें मंगाने में समय और लॉजिस्टिक दिक्कतें थीं.
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