Rajasthan News: राजस्थान के सीकर जिले के रींगस कस्बे में होली का एक ऐसा रंग देखने को मिलता है जो देश भर में विरला है। यहां होलिका दहन के अगले दिन गोपीनाथ राजा मंदिर के सामने हजारों की भीड़ जुटती है, जहां गम और खुशी का अद्भुत संगम मुर्दे की शव यात्रा और दूल्हे की बारात के रूप में निकलता है।

दोपहर तक गुलाल, फिर शुरू होता है मौत और जिंदगी का सफर
रींगस में होली की शुरुआत सुबह 8 बजे भजनों और रंग-गुलाल के साथ होती है। युवा रींगस नरेश के दरबार में जमकर थिरकते हैं। लेकिन असली रोमांच दोपहर 1:30 बजे शुरू होता है, जब रंग खेलना बंद कर दिया जाता है और दो विपरीत यात्राएं तैयार की जाती हैं। कस्बे के एक युवक को दूल्हा बनाकर ऊंट-घोड़े पर बैठाया जाता है, वहीं दूसरी ओर हिंदू रीति-रिवाज से एक प्रतीकात्मक मुर्दे की अर्थी सजाई जाती है।
यह यात्रा कस्बे के मुख्य मार्गों से निकलती है। अर्थी के पीछे लोग मातम मनाते चलते हैं, जो समाज में व्याप्त बुराइयों के अंत का प्रतीक है। वहीं, दूल्हे की बंदोरी आगामी वर्ष की खुशियों और नई शुरुआत का संदेश देती है। यह शव यात्रा सीधे श्मशान घाट पहुंचती है, जहां प्रतीकात्मक मुर्दे का दाह संस्कार किया जाता है और भक्त प्रहलाद की आरती उतारी जाती है।
98 वर्षीय स्वतंत्रता सेनानी कालीदास स्वामी के अनुसार, इस परंपरा की जड़ें एक ऐतिहासिक विवाद से जुड़ी हैं। दशकों पहले कस्बे में ताजिया निकालने को लेकर हुए एक समझौते के तहत यह तय हुआ था कि जब तक होली पर मुर्दे की शव यात्रा निकलती रहेगी, तब तक यहां अन्य कोई नया जुलूस नहीं निकाला जाएगा। नगर सेठ नाथूलाल काबरा बताते हैं कि यह प्रथा उनके जन्म से पहले की है और अब इसमें भजनों और नवाचारों का तड़का भी लग गया है।
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