Bihar News: बिहार में आरक्षण को लेकर केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान और जीतन राम मांझी के बीच सिर फुटव्वल मचा हुआ है। एक तरफ चिराग का कहना है कि आरक्षण खत्म करना तो दूर उन्हें इनकी समीक्षा भी मंजूर नहीं है। वहीं, दूसरी ओर मांझी परिवार (जीतन राम मांझी व संतोष सुमन) आरक्षण में संसोधन के पक्ष में हैं और उनकी मांग है कि जिसकी जीतनी हिस्सेदारी उस हिसाब से उसे आरक्षण मिले। इस बीच अब आरक्षण मुद्दे को लेकर लालू यादव की बेटी रोहिणी आचार्य की भी प्रतिक्रिया सामने आई है। उन्होंने कहना है कि, जब तक सामाजिक-आर्थिक गैर बराबरी कायम है, तब तक आरक्षण की व्यवस्था की किसी प्रकार की समीक्षा उचित नहीं है।

तब तक आरक्षण की समीक्षा उचित नहीं- रोहिणी

रोहिणी आचार्य ने सोशल मीडिया एक्स पर एक पोस्ट साझा करते हुए लिखा, जब तक सामाजिक – आर्थिक गैर बराबरी कायम है, तब तक आरक्षण की व्यवस्था की किसी प्रकार की समीक्षा उचित नहीं है। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि, आरक्षण की वर्तमान व्यवस्था केवल एक कल्याणकारी कार्यक्रम नहीं, बल्कि भारत में सदियों से चले आ रहे सामाजिक भेदभाव और असमानता को दूर करने का एक संवैधानिक तथा संरचनात्मक माध्यम है। जब भी ‘आरक्षण की समीक्षा’ की बात उठती है, तो इसे केवल प्रशासनिक या आर्थिक नजरिए से देखने की बजाय इसके पीछे के सामाजिक न्याय के सिद्धांत को समझना आवश्यक है।

रोहिणी ने बताया आरक्षण का उद्देश्य

रोहिणी आचार्य ने कहा कि, आरक्षण का प्राथमिक उद्देश्य सिर्फ गरीबी दूर करना नहीं, बल्कि उन समुदायों की शासन, प्रशासन, शिक्षा और लोकतांत्रिक व्यवस्था की मुख्यधारा में भागीदारी (प्रतिनिधित्व) सुनिश्चित करना है , जिन्हें मुख्यधारा से रूप से दूर रखा गया। जब तक सभी वर्गों का आनुपातिक प्रतिनिधित्व हासिल नहीं होता, सामाजिक व् आर्थिक समरसता कायम नहीं होती, गैर बराबरी की खाई पाटी नहीं जाती, तब तक इसके स्वरूप को बदलना अनुचित होगा।

रोहिणी ने आगे कहा कि, कागजी प्रगति के बावजूद जमीनी स्तर पर जातिगत भेदभाव और सामाजिक – आर्थिक असमानता देश में आज भी मौजूद है। आरक्षण वंचित वर्गों को सुरक्षात्मक कवच प्रदान करता है , ताकि वे बिना किसी पक्षपात एवं अवरोध के आगे बढ़ सकें।

आरक्षण को बताया सामाजिक न्याय की गारंटी

उन्होंने कहा कि, देश का संविधान (विशेष रूप से अनुच्छेद 15 और 16) अवसरों की समता और सामाजिक न्याय की गारंटी देता है। वर्तमान आरक्षण व्यवस्था बाबा साहेब डॉक्टर बी.आर. अंबेडकर और संविधान सभा के उस दृष्टिकोण का परिणाम है जो वंचितों के सशक्तिकरण को राष्ट्र निर्माण की पहली शर्त मानता है।

आरक्षण की समीक्षा के किसी भी प्रयास से अक्सर वंचित वर्गों की सामाजिक सुरक्षा और अधिकारों में कटौती किए जाने की संभावना बनी ही रहती है। अतः आरक्षण के वर्तमान प्रावधानों को बिना किसी उप-वर्गीकरण व् समीक्षा के यथावत बनाए रखना सामाजिक संतुलन, न्याय और लोकतंत्र की समावेशी भावना को सुदृढ़ रखने के लिए अत्यंत आवश्यक है।

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