रोहतक में एंटी करप्शन ब्यूरो ने आरटीओ ऑफिस के दो अधिकारियों को 1 लाख रुपये की रिश्वत लेते गिरफ्तार किया है, जो 150 गाड़ियों को बिना रोक-टोक चलाने के बदले वसूली जा रही थी।
कृष्ण कुमार सैनी, चंडीगढ़। हर महीने लाखों में घूमने वाला एक खेल… सड़क पर दौड़ती गाड़ियां… और उनके पीछे चलता एक ऐसा “सिस्टम”, जहां कार्रवाई से बचने का कथित रेट पहले से तय था। गाड़ी जितनी, रकम उतनी। आरोप है कि यहां कानून से ज्यादा ताकत “मंथली सेटिंग” की चल रही थी। सब कुछ आराम से चल रहा था, क्योंकि देने वाला भी खुश और लेने वाले भी निश्चिंत थे। लेकिन इस बार कहानी में अचानक ऐसा मोड़ आया कि पूरा खेल खुलकर सामने आ गया।
बताया जा रहा है कि पहले रकम लाखों में मांगी गई, फिर बातचीत हुई, सौदेबाजी चली और आखिर में महीना फिक्स हो गया। किस्तें भी पहुंचती रहीं। सिस्टम इतना “सेट” माना जा रहा था कि किसी को शक तक नहीं था कि अगली डिलीवरी सीधे एंटी करप्शन ब्यूरो के कैमरे और टीम तक पहुंचा देगी। जैसे ही अगली किस्त टेबल तक पहुंची, पूरा दफ्तर सन्न रह गया।
रोहतक में एंटी करप्शन ब्यूरो (ACB) ने बड़ी कार्रवाई करते हुए आरटीओ ऑफिस के ट्रैफिक सब इंस्पेक्टर Rakesh Rana और सहायक सचिव Manish Madan को एक लाख रुपए की रिश्वत लेते हुए रंगे हाथ गिरफ्तार कर लिया। आरोप है कि दोनों अधिकारियों ने करीब 150 गाड़ियों के संचालन के बदले प्रति गाड़ी 7 हजार रुपए मासिक रिश्वत तय कर रखी थी।
एसीबी के डीएसपी Sombir Deswal के मुताबिक शुरुआत में करीब साढ़े 10 लाख रुपए की मांग की गई थी, लेकिन बाद में मामला 8 लाख रुपए महीना पर जाकर सेट हुआ। शिकायतकर्ता पहले ही 6 लाख रुपए आरोपियों को दे चुका था। पहली किस्त में साढ़े 3 लाख और दूसरी बार ढाई लाख रुपए दिए गए। इसके बाद जब एक लाख रुपए की अगली किस्त देने की बारी आई तो शिकायतकर्ता ने एसीबी को सूचना दे दी।
इसके बाद एसीबी ने पूरा ट्रैप बिछाया। जैसे ही रिश्वत की रकम अधिकारियों तक पहुंची, टीम ने दोनों को मौके पर ही दबोच लिया। कार्रवाई के बाद आरटीओ ऑफिस में हड़कंप मच गया। देर तक रिकॉर्ड खंगाले जाते रहे और कई दस्तावेज कब्जे में लिए गए।
जांच में यह भी सामने आया कि दोनों अधिकारियों के खिलाफ पहले से भ्रष्टाचार के मामले दर्ज हैं। मनीष मदान के खिलाफ 2019 का मामला कोर्ट में विचाराधीन है, जबकि राकेश राणा के खिलाफ पंचकूला में दो केस चल रहे हैं।
अब एसीबी यह पता लगाने में जुटी है कि यह “मंथली सिस्टम” कब से चल रहा था और इसमें कौन-कौन शामिल था।

