Sariska Rest House Land Acquisition: राजस्थान हाईकोर्ट ने अलवर जिले के धूअरमाला गांव में प्रस्तावित रेस्ट हाउस के लिए 19 किसानों की जमीन अधिग्रहित करने के आदेश को रद्द कर दिया है। अदालत ने पाया कि प्रस्तावित रेस्ट हाउस सरिस्का टाइगर रिजर्व के क्रिटिकल टाइगर हैबिटेट (CTH) से एक किलोमीटर के भीतर प्रस्तावित था, जबकि इस संवेदनशील क्षेत्र में निर्माण और भूमि उपयोग को लेकर प्रतिबंध लागू हैं।
कोर्ट ने यह भी कहा कि अधिकारियों के पास वैकल्पिक जमीन का विकल्प मौजूद था, फिर भी उस पर उचित तरीके से विचार नहीं किया गया। यह फैसला जस्टिस आनंद शर्मा की एकलपीठ ने बुद्दालाल और अन्य किसानों की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया।

19 किसानों की जमीन अधिग्रहण का था मामला
याचिकाकर्ताओं के वकील अक्षय शर्मा के अनुसार, अक्टूबर 2024 में प्रशासन ने धूअरमाला गांव के 19 किसानों की कृषि भूमि का अधिग्रहण किया था। यह अधिग्रहण NH-28A के शाहपुरा-अलवर सेक्शन के विस्तार के लिए किया गया था।
इसी जमीन पर एनएचआई की ओर से रेस्ट हाउस बनाने का प्रस्ताव रखा गया था। किसानों ने इसका विरोध किया। उनका कहना था कि प्रस्तावित स्थान सरिस्का टाइगर रिजर्व के क्रिटिकल टाइगर हैबिटेट के एक किलोमीटर के भीतर आता है। किसानों की ओर से यह भी दलील दी गई कि सरकार के 2015 के आदेश के अनुसार इस क्षेत्र में वाणिज्यिक और औद्योगिक गतिविधियों के साथ भूमि उपयोग में बदलाव पर रोक है।
पहले अधिकारी ने भी माना था कि जगह बदलना उचित होगा
मामले की सुनवाई के दौरान अदालत को बताया गया कि 31 जनवरी 2025 को भूमि अधिग्रहण अधिकारी ने खुद माना था कि प्रस्तावित रेस्ट हाउस की जमीन CTH के एक किलोमीटर के भीतर है। अधिकारी ने उस समय रेस्ट हाउस को दूसरी जगह स्थानांतरित करना उचित माना था। इसके बाद फरवरी और मार्च 2025 में वैकल्पिक जमीन तलाशने की प्रक्रिया शुरू की गई। जिला कलेक्टर के निर्देश पर निरीक्षण भी कराया गया। एक समिति ने बांदरोले गांव की वैकल्पिक जमीन को प्रस्तावित रेस्ट हाउस के लिए अधिक उपयुक्त माना था। इसके बावजूद बाद में इसी मूल स्थान पर परियोजना आगे बढ़ाने की कोशिश की गई।
6 अक्टूबर 2025 का आदेश हाईकोर्ट ने किया रद्द
अदालत के सामने यह भी आया कि वैकल्पिक जमीन की प्रक्रिया और निरीक्षण के बावजूद 6 अक्टूबर 2025 को भूमि अधिग्रहण अधिकारी ने किसानों की आपत्तियां खारिज कर दीं। हाईकोर्ट ने इस आदेश को रद्द कर दिया। अदालत ने कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि किसानों की आपत्तियों को खारिज करते समय अधिकारी ने सभी प्रासंगिक पहलुओं पर विचार नहीं किया। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी परियोजना को सार्वजनिक सुविधा या पब्लिक यूटिलिटी बता देने मात्र से उस पर लागू कानूनी प्रतिबंध खत्म नहीं हो जाते।
वन विभाग के आदेश के बावजूद आगे बढ़ी परियोजना
हाईकोर्ट ने वन विभाग के रिकॉर्ड का भी उल्लेख किया। अदालत के अनुसार, वन विभाग ने अपने पत्र में CTH के एक किलोमीटर के भीतर निर्माण पर लागू प्रतिबंध को स्पष्ट किया था। इसके बावजूद हाईवे अथॉरिटी ने उसी स्थान पर रेस्ट हाउस की योजना को आगे बढ़ाने की कोशिश की।
अदालत ने कहा कि अधिकारियों को शुरुआत में ही रिकॉर्ड पर यह स्पष्ट कर लेना चाहिए था कि प्रस्तावित स्थान प्रतिबंधित क्षेत्र में आता है। इसके बाद वैकल्पिक जगह तलाशनी चाहिए थी। जब वैकल्पिक जमीन उपलब्ध थी, तब बिना ठोस कारण बताए दोबारा मूल स्थान को चुनना उचित नहीं था।
एनएचआई ने कहा- यह सार्वजनिक सुविधा है
मामले में एनएचआई की ओर से दलील दी गई कि प्रस्तावित रेस्ट हाउस कोई वाणिज्यिक परियोजना नहीं है। इसे हाईवे का इस्तेमाल करने वाले लोगों के लिए सार्वजनिक सुविधा के रूप में विकसित किया जाना था।
लेकिन अदालत ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने कहा कि प्रस्तावित रेस्ट हाउस में फ्यूल स्टेशन और कियोस्क जैसे तत्व भी शामिल हैं, जिनका स्वरूप वाणिज्यिक है। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी परियोजना को सार्वजनिक सुविधा का नाम देने से पर्यावरण और वन संबंधी कानूनी प्रतिबंध समाप्त नहीं हो जाते।
किसानों की जमीन पर अब परियोजना को झटका
हाईकोर्ट के इस फैसले से धूअरमाला गांव के 19 किसानों की जमीन के अधिग्रहण से जुड़ा विवाद फिलहाल किसानों के पक्ष में गया है। अदालत ने 6 अक्टूबर 2025 के आदेश को रद्द करते हुए मामले में लागू पर्यावरणीय और वन संबंधी प्रतिबंधों को ध्यान में रखने पर जोर दिया है।
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