आरिफ शेख, श्योपुर। श्योपुर को भले ही कागजों में कुपोषण मुक्त बताया जा रहा हो, लेकिन जमीनी हकीकत सरकारी दावों पर सवाल खड़े कर रही है। मुख्यमंत्री बाल आरोग्य संजीवनी कोष के आंकड़े बताते हैं कि गंभीर कुपोषण से जूझ रहे बड़ी संख्या में बच्चों को स्वस्थ हुए बिना ही डिस्चार्ज किया जा रहा है। जून में करीब 42 फीसदी और जुलाई में करीब 43 फीसदी बच्चे पूरी तरह स्वस्थ हुए बिना ही घर भेज दिए गए। वहीं श्योपुर की एक सहराना बस्ती में ऐसे बच्चे भी मिले, जो आंगनबाड़ी केंद्रों में दर्ज तक नहीं हैं।

श्योपुर में कुपोषण के खिलाफ सरकारी दावों की पोल आंकड़े खोल रहे हैं। जून में एनआरसी और संबंधित केंद्रों से डिस्चार्ज किए गए 1,957 बच्चों में से सिर्फ 57.7 प्रतिशत बच्चे स्वस्थ हुए। जबकि 42.3 प्रतिशत बच्चों को पूरी तरह स्वस्थ हुए बिना ही डिस्चार्ज कर दिया गया। जुलाई में भी तस्वीर नहीं बदली। 1,205 बच्चों में से सिर्फ 56.5 प्रतिशत बच्चे स्वस्थ हो सके, जबकि 43.5 प्रतिशत बच्चे बिना पूरी रिकवरी के बाहर हो गए।

रिकवरी रेट पर उठे सवाल

सरकारी रिकॉर्ड में पंजीयन का लक्ष्य 166 प्रतिशत तक पूरा होने का दावा किया जा रहा है, लेकिन रिकवरी रेट लगातार सवाल खड़े कर रहा है। सवाल यह है कि जब बच्चे गंभीर कुपोषण की स्थिति में भर्ती होते हैं, तो इलाज के बाद भी बड़ी संख्या में बच्चे स्वस्थ क्यों नहीं हो पा रहे हैं? एनआरसी में भर्ती दो साल चार महीने के कान्हा की हालत भी व्यवस्था की गंभीर तस्वीर दिखाती है। कलमी निवासी कान्हा पुत्र मंगल का वजन महज 4 किलो 860 ग्राम है। उम्र के लिहाज से यह वजन बेहद कम है और बच्चा गंभीर कुपोषण की श्रेणी में आता है।

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परिजनों का कहना है कि बच्चा जन्म से ही कमजोर है और पिछले महीने ही उसे अति कुपोषित बच्चों की सूची में शामिल किया गया। इतना ही नहीं बल्कि कलारना गांव में भी माया आदिवासी की बेटी की उम्र 4 साल हो चुकी है लेकिन उसके बाद भी उसका वजन लगभग 9 किलो है। जिससे आप समझ सकती है कि कुपोषण को दूर करने के लिए प्रशासन के दावे सिर्फ हवा हवाई है और जमीन हकीकत क्या है।

इलाज के बाद भी वजन में बढ़ोतरी नहीं

परिजनों के मुताबिक, इलाज के बावजूद बच्चे के वजन में अपेक्षित बढ़ोतरी नहीं हो रही। महिला एवं बाल विकास विभाग की ओर से बच्चे का वजन नहीं बढ़ने की बात कही जा रही है और बीमारी को इसकी वजह बताया जा रहा है। लेकिन सवाल यही है कि एनआरसी में भर्ती होने के बाद भी बच्चे की सेहत में सुधार क्यों नहीं हो रहा? रघुनाथपुर के पास करीब 25 परिवारों की सहराना बस्ती में भी कुपोषण की चिंताजनक तस्वीर सामने आई। जहां तीन कमजोर बच्चे मिले, जिनका किसी आंगनबाड़ी केंद्र में पंजीयन तक नहीं था। इनमें तीन साल के आशिक का वजन महज 6.9 किलो और चार साल के चेतन का वजन सिर्फ 5.35 किलो पाया गया।

क्या कहते है NFHS-6 के आंकड़े

यानी सरकारी रिकॉर्ड और जमीनी हकीकत के बीच बड़ा अंतर नजर आ रहा है। एक तरफ कागजों में लक्ष्य पूरे होने का दावा है, तो दूसरी तरफ ऐसे बच्चे सरकारी निगरानी और पोषण व्यवस्था से बाहर दिखाई दे रहे हैं। अगर मध्यप्रदेश के आंकड़ों पर नजर डालें तो तस्वीर और भी चिंताजनक है। NFHS-6 के आंकड़ों के मुताबिक, प्रदेश में करीब 24 प्रतिशत बच्चे लंबाई के हिसाब से दुबलेपन की गंभीर स्थिति में हैं। पांच साल पहले यह आंकड़ा करीब 19 प्रतिशत था। यानी सुधार की जगह स्थिति और खराब होने का दावा सामने आ रहा है।

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वहीं उम्र के हिसाब से कम वजन वाले बच्चों का आंकड़ा भी करीब 39.7 प्रतिशत बताया गया है। पिछले सर्वेक्षण में यह करीब 33 प्रतिशत था। आंकड़े बताते हैं कि कुपोषण से लड़ाई में अभी लंबा रास्ता तय करना बाकी है। कुपोषण के खिलाफ करोड़ों रुपये की योजनाएं और तमाम दावे किए जा रहे हैं, लेकिन श्योपुर के आंकड़े और बस्तियों की तस्वीर इन दावों की हकीकत पर गंभीर सवाल खड़े कर रही है। अब जरूरत सिर्फ पंजीयन बढ़ाने की नहीं, बल्कि बच्चों के वास्तविक स्वास्थ्य और पूरी रिकवरी की निगरानी करने की है।

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