अहमदाबाद। सावन के पहले सोमवार पर प्रथम ज्योतिर्लिंग भगवान सोमनाथ महादेव की भक्ति का अनूठा डिजिटल विस्तार देखने को मिल रहा है। मंदिर के अलौकिक श्रृंगार, भव्य आरती और धार्मिक गतिविधियों के वीडियो व रील्स अब देश ही नहीं, बल्कि दुनिया भर के श्रद्धालुओं के मोबाइल स्क्रीन तक सीधे पहुंच रहे हैं।
2015 से शुरू हुआ ई-दर्शन का सफर
भक्तों को घर बैठे महादेव के दर्शन कराने के लिए वर्ष 2015 में ई-दर्शन सेवा शुरू की गई थी। वर्तमान में श्री सोमनाथ ट्रस्ट के 7 सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म और आधिकारिक वेबसाइट के माध्यम से सुबह, दोपहर और शाम के दिव्य श्रृंगार दर्शन उपलब्ध कराए जाते हैं। आंकड़ों के मुताबिक, डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के जरिए 45 से अधिक देशों के करोड़ों श्रद्धालु सोमनाथ महादेव से जुड़ चुके हैं। रील्स और शॉर्ट्स के जरिए खासकर युवा पीढ़ी में इस आस्था का क्रेज तेजी से बढ़ा है।
ऑनलाइन पूजा से लेकर ठहरने की सुविधा
ई-दर्शन के अलावा श्रद्धालुओं के लिए ऑनलाइन पूजा-पाठ, दान, प्रसाद और ठहरने की अग्रिम बुकिंग जैसी आधुनिक सुविधाएं भी उपलब्ध हैं। ट्रस्ट की ओर से सागर दर्शन व लीलावती अतिथि गृह के साथ एसी और नॉन-एसी डोरमेट्री की व्यवस्था है। इसके अलावा, अगस्त 2022 से श्रद्धालुओं के लिए नि:शुल्क शुद्ध सात्विक भोजन की सुविधा भी संचालित की जा रही है।
समुद्र दर्शन पथ और लाइट-साउंड शो
मंदिर परिसर के पास बना 1.5 किलोमीटर लंबा ‘समुद्र दर्शन पथ’ (वॉक-वे) पर्यटकों के आकर्षण का मुख्य केंद्र है, जहां वॉकिंग, साइक्लिंग, बायनोक्यूलर, घुड़सवारी और ऊंट सवारी का आनंद लिया जा सकता है। वहीं, शाम के समय लाइट एंड साउंड शो के माध्यम से सोमनाथ के गौरवशाली इतिहास को दर्शाया जाता है।
ऐतिहासिक महत्व: स्वाभिमान के 1000 वर्ष
सोमनाथ मंदिर ने इतिहास में कई आक्रमण झेले और हर बार इसका पुनरुत्थान हुआ। 1026 में महमूद गजनी के आक्रमण के बाद राजा कुमारपाल, अहिल्याबाई होल्कर और आधुनिक भारत में सरदार वल्लभभाई पटेल के प्रयासों से इसका पुनर्निर्माण हुआ। 11 मई 1951 को देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने नए मंदिर में प्राण-प्रतिष्ठा की थी। इस वर्ष मंदिर की स्वाभिमान यात्रा के 1000 वर्ष और पुनर्निर्माण के 75 वर्ष पूरे हो रहे हैं, जिसे ‘सोमनाथ स्वाभिमान पर्व’ के रूप में मनाया जा रहा है।
नागर शैली का अद्भुत नक्काशीदार मंदिर
155 फीट ऊंचे सप्तभौम शिखर वाला यह मंदिर नागर शैली में निर्मित है। डिजिटल दौर में भी 1000 साल पुरानी आस्था नए माध्यमों के जरिए लगातार निखर रही है।
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