रायपुर। भारतीय संस्कृति के महान ग्रंथ रामचरितमानस में वर्णित प्रसंग हर अवसर, हर काल में प्रासंगिक और जीवन के गहरे नैतिक संदेश देने वाले होते हैं। अयोध्याकाण्ड का एक अत्यंत मार्मिक प्रसंग हमें सिखाता है कि सच्चा नेतृत्व और श्रेष्ठ चरित्र कैसा होना चाहिए।

“राम सखा सुनि संदनु त्यागा। चले उतरि उमगत अनुरागा॥
गाउँ जाति गुहँ नाउँ सुनाई। कीन्ह जोहारु माथ महि लाई॥” इस चौपाई में चित्रण है कि जब भरत जी को यह ज्ञात होता है कि निषादराज गुह जो समाज में एक अलग स्थान रखते हैं मगर भगवान श्री राम के मित्र हैं। निषादराज को देखते ही भरत जी अपने रथ से उतर गए, वो रथ जो वैभव, सत्ता और अहंकार का प्रतीक है उस रथ का त्याग कर प्रेम और विनम्रता के साथ पैदल ही उनकी ओर बढ़ते हैं। यह दृश्य केवल अलग-अलग श्रेणी और हैसियत के दो व्यक्तियों का मिलन नहीं बल्कि भारतीय समाज के लिए एक आदर्श चित्र है जहाँ जाति, पद और वैभव से ऊपर उठकर मनुष्यत्व और प्रेम को प्राथमिकता दी गई है। भरत जी का यह व्यवहार हमें यह बताता है कि सच्ची महानता पद या संपत्ति में नहीं बल्कि विनम्रता और संवेदनशीलता में होती है।

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आज के संदर्भ में भी भरत जी का संदेश प्रासंगिक

आज आधुनिक भारत में भौतिकता और दिखावे की होड़ ने समाज में एक अलग प्रकार की दूरी पैदा कर दी है। वीआईपी कल्चर, बड़ी-बड़ी गाड़ियों के काफिले, और अनावश्यक प्रदर्शन ये सभी उस रथ के ही आधुनिक और नए रूप हैं जिसे कभी भरत जी ने त्याग दिया था। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा ऊर्जा संरक्षण और ईंधन की बचत का जो आह्वान किया गया है वह कोई प्रशासनिक अपील नहीं थी बल्कि महज़ एक सामाजिक चेतना का आग्रह था। यही आग्रह हमें याद दिलाता है कि संसाधन सीमित हैं और उसके विवेकपूर्ण उपयोग से ही भविष्य को सुरक्षित रखा जा सकता है। कोविड काल में भी हमने देखा कि जब प्रधानमंत्री ने थाली बजाने और दीप जलाने का आग्रह किया था तो देश की जनता ने उसे परिवार के वरिष्ठ सदस्य के आदेश की तरह अतार्किक होकर स्वीकार किया था। यही विश्वास भारत की समग्र ताकत भी है।

सादगी से मिलती है स्वास्थ्य, सफलता और समृद्धि

आज ऐसे कई उदाहरण सामने आए हैं जिसमें न्यायाधीश, अधिकारी और आम नागरिक साइकिल से कार्यालय जाने लगे हैं। उनका यह कृत्य सिर्फ़ ईंधन की बचत के लिए नही है बल्कि यह बताने के लिए है कि ऐसा भी किया जा सकता है। हालाँकि कुछ स्थानों पर अब भी वीआईपी कल्चर की झलक देखने को मिल रही है जहाँ जनप्रतिनिधि लंबी गाड़ियों के काफिले के साथ रैलियाँ निकाल रहे हैं। यह न केवल ईंधन का अपव्यय है बल्कि आम जनता से दूरी बढ़ाने वाला कर्म है। भरत जी का रथ से उतरना हमें यही सिखाता है कि जब तक हम अपने अहंकार और दिखावे को नहीं छोड़ेंगे तब तक समाज में वास्तविक समानता और निकटता संभव नहीं है।ईंधन की बचत केवल आर्थिक आवश्यकता नहीं यह हमारी पर्यावरणीय जिम्मेदारी भी है। बढ़ते प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक संसाधनों के क्षरण के बीच यह ज़रूरी हो गया है कि हम अपने जीवन में सादगी को जगह दें। यदि भरत जी जैसे राजकुमार अपने गर्व के रथ का त्याग कर सकते हैं तो क्या राष्ट्र के जनप्रतिनिधि अपनी छोटी-छोटी सुविधाओं में कटौती कर देश के समक्ष उदाहरण प्रस्तुत नही कर सकते? क्या अनावश्यक यात्रा, बड़ी गाड़ियों के उपयोग और दिखावे को कम करना मुमकिन ही नही ?

जनप्रतिनिधि जितने सरल, सहज और मिलनसार होंगे, उतना ही वे जनता के नज़दीक होंगे। बड़ी गाड़ियों और काफिलों के बीच बैठा नेता जनता की समस्याओं को उतनी गहराई से नहीं समझ पाएँगे जितना एक सादा जनप्रतिनिधि। भरत जी का उदाहरण हमें यह सिखाता है कि समझ, संवेदना और समानता ही नेतृत्व का मूल तत्व है। आज जब हम विकास और आधुनिकता की दौड़ में आगे बढ़ रहे हैं तब यह और आवश्यक हो गया है कि हम अपने मूल्यों को न भूलें। सच्चा विकास भौतिक ही नहीं बल्कि नैतिक और सामाजिक भी होना चाहिए। भरत जी का रथ त्यागने की घटना दरअसल एक विचार है जो हमें सादगी, समानता और संवेदनशीलता की ओर ले जाता है।

लेखक – संदीप अखिल सलाहकार संपादक न्यूज़ 24 मध्य प्रदेश छत्तीसगढ़ / लल्लूराम डॉट कॉम