Supreme Court Harsh Comment On Corporate Ministry: कॉर्पोरेट मंत्राल ने दो सबसे महत्वपूर्ण नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) और अपीलीय न्यायाधिकरण (NCLAT) को पूरी तरह से अपने कब्जे में (हाईजैक) कर लिया है। यह तीखी टिप्पणी सुप्रीम कोर्ट ने NCLT और नेशनल कंपनी लॉ अपीलीय ट्रिब्यूनल (NCLAT) में काम कर रहे संविदा (कॉन्ट्रैक्ट) कर्मचारियों का दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान की। णी मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने याचिका पर सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी की।

सीजेआई सूर्य कांत की पीठ ने NCLT और NCLAT के अध्यक्षों को नियुक्तियों के मामले में स्वायत्तता (आजादी) देने की वकालत की। साथ ही, उन्होंने अंतरिम उपाय के तौर पर प्रतिनियुक्ति (डेपुटेशन) का सुझाव दिया और UPSC या SSC के जरिए चरणबद्ध तरीके से नियमित भर्तियां करने की बात कही।

सुनवाई के दौरान सीजेआई ने कहा कि मुझे पता है कि ठेकेदार कैसे हथकंडे अपनाते हैं। उनको न्यायिक या तकनीकी सदस्यों की कोई परवाह नहीं होती। अध्यक्षों के पास भर्तियां करने की पूरी स्वायत्तता होनी चाहिए। वे भर्तियां UPSC/SSC के जरिए कर सकते हैं। कॉरपोरेट मामलों के मंत्रालय का रिब्यूनल पर पूरी तरह से कब्जा है। यह संस्था की स्वायत्तता में दखल है। समस्या यही है कि मंत्रालय इस पर पूरी तरह कंट्रोल रखना चाहता है, जो कि दुर्भाग्यपूर्ण है।

सुनवाई के दौरान कोर्ट ने की ये टिप्पणी

कॉन्ट्रैक्चुअल वर्कर्स का पक्ष रखते हुए उन्होंने कहा कि इन लोगों ने छह सालों तक काम किया है। संविदा पर होने का ये मतलब नहीं कि इनके कोई अधिकार नहीं हैं।  जब MCA उनको  संविदा पर नियुक्त करती है तो उनको HRA या DA का हक नहीं मिलता है। ये इसलिए क्यों कि आप उनको फुल टाइम कर्मचारी नहीं बनाना चाहते। उन्होंने कहा कि NCLT के भर्ती नियमों में रेगुलराइजेशन का प्रावधान है और विज्ञापन में भी ऐसा ही कहा गया है। अपना अनुभव साझा करते हुए CJI ने बताया कि बॉम्बे में एक ऐसा मामला सामने आया था, जहां संविदा कर्मचारी मूल रिपोर्ट लेकर भाग गए थे, जिसके बाद FIR दर्ज करानी पड़ी थी। उन्हें न्यायिक सदस्यों या तकनीकी सदस्यों की कोई परवाह नहीं है। तकनीकी सदस्य अभी भी कुछ चीजों में हेरफेर कर रहे हैं। मैं इसे खुली अदालत में नहीं कहना चाहता।  ये संविदा कर्मचारी न्यायिक सदस्यों को परेशान कर रहे हैं। 

संविदा कर्मचारियों ने दायर की है याचिका
दरअसल संविदा कर्मचारियों की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता मीनाक्षी अरोड़ा ने दलील दी कि अदालत को इस मामले में फैसला लेना चाहिए। उन्होंने कहा कि जो लोग लंबे समय से काम कर रहे हैं, उन्हें रातों-रात नौकरी से नहीं निकाला जाना चाहिए। मुझे जिम्मेदारी के साथ यह बताने के लिए कहा गया है कि पूरी संभावना है कि 1 या 2 नवंबर को मौजूदा कर्मचारियों को काम छोड़ना पड़ेगा और नियुक्तियां एक निजी कंपनी द्वारा की जाएंगी। उन्होंने छह साल तक काम किया है। भले ही वे संविदा (कॉन्ट्रैक्ट) पर हैं, फिर भी उनके कुछ अधिकार बनते हैं।अगर भर्ती नियमों और विज्ञापन में इसका प्रावधान है, तो उन्हें पूरी तरह से बाहर क्यों निकाला जा रहा है? यह पूरी तरह से मनमाना होगा और अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन करेगा। उन्होंने कहा, “अध्यक्ष की मंजूरी के बिना किसी को भी नौकरी से नहीं निकाला जाना चाहिए। 

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