IDBI Bank Privatization Controversy: इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट बैंक ऑफ इंडिया यानी आईडीबीआई बैंक को मोदी सरकार बेचने जा रही है। मोदी सरकार ने IDBI बैंक के 60.72 परसेंट शेयर कनाडा की फेयरफैक्स फाइनेंशियल होल्डिंग्स को बेचने की मंज़ूरी दी है। आईडीबीआई बैंक को कनाडा की कंपनी को बेचने के फैसले का कांग्रेस समेत पूरे विपक्ष ने विरोध किया है। फैसले से भड़के राहुल गांधी ने तो मोदी सरकार को जमकर सुना डाला है।
राहुल गांधी ने IDBI बैंक के निजीकरण को लेकर केंद्र की मोदी सरकार पर निशाना साधा है। उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस के कार्यकाल में देश के उद्योगों को मजबूत करने के लिए बैंक बनाए गए, जबकि मौजूदा सरकार उन्हें बेच रही है।
लोकसभा नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने सोशल मीडिया एक्स पर लिखा- कांग्रेस के समय में IDBI बना – देश का उद्योग खड़ा करने के लिए। मोदी के समय में पहले बोली देखी गई, फिर दाम तय हुआ। कांग्रेस के time पे बैंक बनते थे। मोदी के time में बिकते हैं। मैं IDBI बैंक के कर्मचारियों के साथ खड़ा हूँ।
वहीं सीपीआई (एम) ने लिखा- IDBI बैंक के 60.72 परसेंट शेयर कनाडा की फेयरफैक्स फाइनेंशियल होल्डिंग्स को बेचने की मंज़ूरी देने का यूनियन कैबिनेट का फ़ैसला RBI की गाइडलाइंस का खुला उल्लंघन है। प्राइवेटाइज़ेशन से सोशल सेक्टर में लोन और छोटे डिपॉज़िटर्स के हितों पर बुरा असर पड़ेगा। असमानता बढ़ने के साथ, पब्लिक सेक्टर बैंकों की यह बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी है कि वे आम लोगों तक बैंकिंग सर्विस पहुँचाएँ और सभी को क्रेडिट तक पहुँच पक्का करें। सरकार को पब्लिक सेक्टर बैंकों में अपनी हिस्सेदारी बेचने के अपने प्लान पर आगे बढ़ने से बचना चाहिए।
80 हजार करोड़ रुपये जुटाने का है लक्ष्य
बता दें कि केंद्र सरकार ने आईडीबीआई बैंक और एलआईसी की कुल 60.72% हिस्सेदारी कनाडा की फेयरफैक्स फाइनेंशियल होल्डिंग्स समर्थित कंपनी को 52,878 करोड़ रुपये में बेचने की मंजूरी दी गई है। इस सौदे से सरकार को विनिवेश के लक्ष्य से ज्यादा रकम जुटाने में मदद मिल सकती है। केंद्र सरकार ने वित्त वर्ष 2026-27 में विनिवेश (सरकारी कंपनियों में हिस्सेदारी बेचना) से 80 हजार करोड़ रुपये जुटाने का लक्ष्य रखा है। 10 सितंबर तक 62,124 करोड़ रुपये जुटाए जा चुके थे।शेयर बिक्री से 55,757 करोड़ और संपत्तियां बेचने से 6,367 करोड़ मिले। आईडीबीआई बैंक की डील पूरी होने पर सरकार की कुल प्राप्तियां करीब 88 हजार करोड़ रुपये तक पहुंच सकती है।

ग्राहकों और शेयरधारकों पर क्या असर
इसका आम खाताधारकों के डिपॉजिट्स, ब्याज दरों या बैंक सेवाओं पर इसका कोई नकारात्मक असर नहीं पड़ेगा। सभी बैंक सरकारी नियंत्रण और भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के कड़े दिशानिर्देशों के तहत ही ऑपरेट होते रहेंगे। बाजार में ज्यादा शेयर्स आने से निवेशकों के लिए ट्रेडिंग के नए अवसर बनेंगे और बैंकों के शेयर मूल्यांकन में पारदर्शिता आएगी।
क्या यह बैंक का निजीकरण है?
यह ध्यान देना जरूरी है कि हिस्सेदारी में 75% तक की कटौती पूर्ण रूप से निजीकरण नहीं है। इस कदम का मुख्य उद्देश्य बैंकों का शेयर बाजार में पब्लिक फ्लोट बढ़ाना और उनकी लिक्विडिटी में सुधार करना है, जिससे बैंक की मार्केट वैल्यूएशन बेहतर हो सके। पूर्ण निजीकरण में बैंक का मालिकाना हक निजी हाथों में सौंपा जाता है। हालांकि, NITI आयोग ने पूर्व में सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया और इंडियन ओवरसीज बैंक को निजीकरण के संभावित उम्मीदवारों के रूप में शॉर्टलिस्ट किया था, लेकिन इसके लिए संसद में बैंकिंग कानून (संशोधन) विधेयक पारित करना अनिवार्य होगा।
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