पटना। ​दिल्ली में हाल ही में संपन्न इंडिया गठबंधन की बैठक में बिहार की राजनीति के लिए बड़ा रोडमैप तैयार किया गया है। सत्ता पक्ष के बढ़ते दबाव और हालिया चुनावी झटकों के बीच, विपक्ष ने एकजुट होकर सरकार को घेरने की योजना बनाई है।

​1. महागठबंधन की फिर से वापसी

​बैठक का सबसे बड़ा निर्णय बिहार में महागठबंधन को दोबारा पूरी तरह से सक्रिय करना है। अब तक चुनाव दर चुनाव राजद और कांग्रेस के बीच जो ‘किच-किच’ और वैचारिक मतभेद देखने को मिलते थे, उन्हें किनारे रखकर सभी सहयोगी पार्टियां (राजद, कांग्रेस, लेफ्ट, वीआईपी) एक मंच पर आएंगी। यह गठबंधन अब महज चुनावी साझेदारी नहीं, बल्कि जनता के मुद्दों पर निरंतर संघर्ष करेगा।

​2. अस्तित्व की लड़ाई और एकजुटता

​चुनावों में मिली हार और बढ़ते राजनीतिक दबाव (जैसे राबड़ी आवास खाली करने का नोटिस और सुरक्षा में कटौती) ने विपक्ष को यह एहसास करा दिया है कि अलग-थलग रहने से उनका अस्तित्व खतरे में है। लालू परिवार और अन्य सहयोगी दलों के लिए अब एकजुट होना ही एकमात्र विकल्प है। माले महासचिव दीपंकर भट्टाचार्य के अनुसार, गठबंधन में अब ‘गिले-शिकवे’ भुलाकर साझा एजेंडे पर काम करने पर सहमति बनी है।

​3. तेजस्वी की बढ़ती ताकत

​कांग्रेस का साथ मिलने से तेजस्वी यादव को एक नई मनोवैज्ञानिक बढ़त मिली है। हाल के राज्यसभा चुनाव में मिली हार के बाद तेजस्वी पर सवाल उठ रहे थे, लेकिन अब कांग्रेस और अन्य सहयोगी दलों के खुले समर्थन से उनकी छवि और ताकत दोनों को मजबूती मिलेगी। तेजस्वी ने पटना लौटते ही सरकार के खिलाफ आक्रामक तेवर अपना लिए हैं, जो गठबंधन से मिली नई ऊर्जा को दर्शाता है।

​4. सरकार के खिलाफ साझा आंदोलन

​विपक्ष की रणनीति अब जमीनी स्तर पर सरकार को घेरने की है। चाहे जनता के मुद्दे हों या सरकार के विवादास्पद फैसले, सभी पार्टियां अब मिलकर धरना-प्रदर्शन करेंगी। आरजेडी जहां संगठन को मजबूत कर रही है, वहीं कांग्रेस और लेफ्ट भी सदस्यता अभियान चलाकर अपनी जड़ें जमा रही हैं। तेजस्वी की चुनौती अब इन सभी दलों के बीच बेहतर समन्वय बनाकर सम्राट चौधरी सरकार की आक्रामक राजनीति का मुकाबला करना है।