Dharm Desk- ब्रज भगवान श्रीकृष्ण की पावन लीला स्थली है, जहां हर वर्ष लाखों श्रद्धालु 84 कोस परिक्रमा के लिए पहुंचते है. यह यात्रा केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि आस्था, भक्ति और आत्मिक शुद्धि का मार्ग हैं. ब्रज 84 कोस परिक्रमा का विशेष महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है, क्योंकि यह अधिक मास, भाद्रपद और कार्तिक जैसे पवित्र महीनों में की जाएगी.

अधिक मास में ब्रज यात्रा अत्यंत पुण्यदायी
अधिक मास जिसे पुरुषोत्तम मास भी कहां जाता है, 17 मई से शुरू होकर 15 जून तक रहेगा. इस अवधि में की गई ब्रज यात्रा को अत्यंत पुण्यदायी माना गया है. इसके अलावा भाद्रपद (अगस्त–सितंबर) और कार्तिक (अक्टूबर–नवंबर) मास में भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु परिक्रमा करते है, इन तीनों अवधियों को परिक्रमा के लिए सबसे शुभ समय माना जाता है.
परिक्रमा का मार्ग क्या होता है
ब्रज 84 कोस परिक्रमा लगभग 250 से 300 किमी की लंबी यात्रा होती है, जिसे पूरा करने में करीब 30 से 40 दिन लगते है. यह परिक्रमा भगवान श्रीकृष्ण की बाल और किशोर लीलाओं से जुड़े प्रमुख स्थलों का दर्शन कराती है. इसमें मथुरा, वृंदावन, गोवर्धन, बरसाना, नंदगांव और गोकुल जैसे पवित्र स्थान शामिल होते है. अधिकांश श्रद्धालु मथुरा से संकल्प लेकर यात्रा शुरू करते हैं और यहीं समाप्त करते हैं.
84 कोस और गोवर्धन परिक्रमा में अंतर
इस परिक्रमा के मार्ग में मधुवन, तालवन, कुमुदवन, राधाकुंड, कोकिलावन जैसे कई दिव्य स्थल आते हैं, जिनका अपना-अपना धार्मिक महत्व है. वहीं गोवर्धन की 21 किलोमीटर की छोटी परिक्रमा भी इसमें शामिल की जाती है. जिसे कुछ ही घंटों में पूरा किया जा सकता है.
परिक्रमा में इन नियमों करना होता है पालन
परिक्रमा के दौरान कुछ नियमों का पालन करना जरूरी माना गया है. श्रद्धालुओं को सात्विक भोजन करना चाहिए. भगवान का नाम जपते रहना चाहिए. ब्रज भूमि का सम्मान करना चाहिए. साथ ही लंबी पैदल यात्रा को देखते हुए स्वास्थ्य का ध्यान रखना. पर्याप्त पानी साथ रखना. आराम दायक कपड़े पहनना भी आवश्यक है.
अधिक मास में इस परिक्रमा का महत्व
मान्यता है कि इस दौरान की गई परिक्रमा से पापों का नाश होता है, मन शुद्ध होता है और भगवान की विशेष कृपा प्राप्त होती हैं. शास्त्रों में कहा गया है कि 84 कोस परिक्रमा करने से 84 लाख योनियों के बंधन से मुक्ति मिलती है. हर कदम पर अश्वमेध यज्ञ के समान फल प्राप्त होता है.
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