दिल्ली में बढ़ती आवारा कुत्तों (stray dog) की समस्या के बीच दिल्ली हाई कोर्ट (Delhi High Court) ने महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए हैं। अदालत ने MCD और NDMC को पायलट प्रोजेक्ट के तहत अपने-अपने एक वार्ड में विशेष कैंप लगाने का आदेश दिया है, जहां आवारा कुत्तों की नसबंदी और टीकाकरण किया जाएगा। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि इन कैंपों का उद्देश्य केवल कुत्तों की नसबंदी और वैक्सीनेशन होगा। कुत्तों को इन केंद्रों पर केवल इसी प्रक्रिया के लिए लाया जाएगा और निर्धारित नियमों के अनुसार कार्रवाई की जाएगी।

सुनवाई के दौरान अदालत ने आवारा कुत्तों की समस्या पर अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि उनका समाधान कुत्तों को हटाने या पूरी तरह समाप्त करने में नहीं है। अदालत ने कहा कि आवारा कुत्तों की आबादी को पूरी तरह खत्म नहीं किया जाना चाहिए और उनकी संख्या का एक न्यूनतम हिस्सा संरक्षित रहना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि कुत्तों की कुल आबादी में कम से कम 5 प्रतिशत हिस्सा बनाए रखा जाना चाहिए, ताकि उनकी नस्ल पूरी तरह समाप्त न हो जाए। अदालत का मानना है कि नसबंदी और टीकाकरण के माध्यम से आबादी को नियंत्रित करना अधिक व्यावहारिक और मानवीय तरीका है।

एक-एक वार्ड में नसबंदी कैंप लगाने का आदेश

अदालत ने दोनों निकायों को अपने-अपने अधिकार क्षेत्र के तहत एक-एक वार्ड में पायलट प्रोजेक्ट के रूप में नसबंदी और टीकाकरण कैंप लगाने का आदेश दिया है। जस्टिस दिनेश मेहता और जस्टिस रजनीश कुमार गुप्ता की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि इन कैंपों में आवारा कुत्तों को केवल नसबंदी और टीकाकरण की प्रक्रिया के लिए लाया जाए। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि संबंधित एजेंसियां यह सुनिश्चित करें और अदालत को बताएं कि इस प्रक्रिया के दौरान आवारा कुत्तों को स्थायी रूप से पकड़ा या कहीं और ले जाया नहीं जा रहा है।

वारा कुत्तों की नस्ल खत्म न हो, 5% आबादी बचाने पर हाईकोर्ट का जोर

जस्टिस दिनेश मेहता और जस्टिस रजनीश कुमार गुप्ता की पीठ ने कहा कि संबंधित अधिकारियों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि आवारा कुत्तों की कुल आबादी का कम से कम 5 प्रतिशत हिस्सा बचा रहे। अदालत का मानना है कि आबादी नियंत्रण के प्रयासों के दौरान उनकी संख्या इतनी कम नहीं होनी चाहिए कि उनकी नस्ल पर ही संकट खड़ा हो जाए। सुनवाई के दौरान पीठ ने मौखिक रूप से कहा कि अगली पीढ़ी भी आवारा कुत्तों को देख सके, इसलिए उनकी आबादी का एक न्यूनतम हिस्सा संरक्षित रहना चाहिए। अदालत ने संकेत दिया कि पशु जन्म नियंत्रण (Animal Birth Control) कार्यक्रम का उद्देश्य संख्या को नियंत्रित करना है, न कि आवारा कुत्तों को पूरी तरह समाप्त करना।

अदालत  ने MCD और NDMC को पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर नसबंदी एवं टीकाकरण अभियान शुरू करने का निर्देश दिया है। अदालत ने कहा कि दोनों निकाय अपने-अपने अधिकार क्षेत्र के एक-एक वार्ड में गली एवं आवारा कुत्तों के स्टरलाइजेशन (नसबंदी) के लिए विशेष कैंप लगाएंगे। जस्टिस दिनेश मेहता और जस्टिस रजनीश कुमार गुप्ता की पीठ ने निर्देश दिया कि इन कैंपों की योजना न्यायमित्र (Amicus Curiae) से परामर्श लेकर तैयार की जाए। अदालत ने कहा कि यह पहल पायलट प्रोजेक्ट के रूप में लागू की जाएगी, ताकि इसके परिणामों और प्रभाव का आकलन किया जा सके।

पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि कैंप शुरू होने से पहले संबंधित इलाके में व्यापक स्तर पर इसकी जानकारी दी जाएगी। लोगों को बताया जाएगा कि आवारा कुत्तों को किसी डॉग पाउंड या आश्रयगृह में भेजने के लिए नहीं पकड़ा जा रहा है, बल्कि उन्हें केवल नसबंदी और टीकाकरण की प्रक्रिया के लिए लाया जा रहा है। अदालत ने जागरूकता बढ़ाने के लिए कैंप स्थल पर प्लेकार्ड और सूचना बोर्ड लगाने का भी निर्देश दिया। इन बोर्डों पर स्पष्ट रूप से लिखा जाएगा कि कुत्तों को केवल स्टरलाइजेशन और वैक्सीनेशन के उद्देश्य से लाया गया है और प्रक्रिया पूरी होने के बाद उन्हें वापस उनके क्षेत्र में छोड़ा जाएगा।

MCD ने हाईकोर्ट को बताया कि इस संबंध में कोई आधिकारिक जनगणना (Census) या प्रमाणित डेटा उपलब्ध नहीं है। हालांकि, उपलब्ध आकलनों के आधार पर दिल्ली में करीब 8 लाख आवारा कुत्ते होने का अनुमान लगाया जाता है। हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान एमसीडी के वकील ने कहा कि राजधानी में आवारा कुत्तों की वास्तविक संख्या का कोई अधिकृत रिकॉर्ड नहीं है, लेकिन विभिन्न अनुमानों के अनुसार यह आंकड़ा लगभग 8 लाख के आसपास हो सकता है।

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