अजय सैनी, भिवानी। नारी सशक्तिकरण और राजनीति में महिलाओं की हिस्सेदारी सुनिश्चित करने की दिशा में मील का पत्थर माने जाने वाले नारी वंदन अधिनियम के पारित न होने पर अब आक्रोश के स्वर तेज होने लगे हैं। इस मुद्दे पर कड़ा रुख अपनाते हुए भिवानी विधानसभा क्षेत्र से पूर्व प्रत्याशी प्रिया असीजा ने इसे देश की करोड़ों महिलाओं की उम्मीदों और उनके संवैधानिक अधिकारों की हत्या करार दिया है। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा कि लोकसभा में जो हुआ, वह केवल एक विधेयक का गिरना नहीं, बल्कि महिला शक्ति के साथ किया गया एक बड़ा विश्वासघात है। भिवानी की धरती से हुंकार भरते हुए प्रिया असीजा ने राजनीतिक दलों पर तीखा प्रहार किया। उन्होंने कहा कि एक महिला होने के नाते मैं यह सवाल पूछना चाहती हूँ कि आखिर कब तक महिलाओं को सिर्फ चुनावी भाषणों और खोखले वादों का हिस्सा बनाया जाएगा? यह बिल गिरा कर एक बार फिर साबित कर दिया गया है कि महिला सशक्तिकरण कई दलों के लिए केवल एक राजनीतिक जुमला है, जमीनी सच्चाई नहीं।

महिलाओं के मुद्दों को जानबूझकर टालना अब एक राजनीतिक रणनीति
असीजा ने आरोप लगाया कि महिलाओं के मुद्दों को जानबूझकर टालना अब एक राजनीतिक रणनीति बन चुकी है। उन्होंने इस बात पर गहरा दुख व्यक्त किया कि जब बात महिलाओं के अधिकारों की थी, तब सभी दलों को एकजुटता दिखानी चाहिए थी, लेकिन यहाँ भी तुच्छ राजनीति ने महिलाओं के हक को पीछे धकेल दिया। प्रिया असीजा ने 17 अप्रैल की तारीख को भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का एक शर्मनाक अध्याय बताया। उन्होंने कहा कि जो दल मंचों से खुद को महिला हितैषी बताते नहीं थकते, वही जब 33 प्रतिशत भागीदारी देने की बात आई तो पीछे हट गए। उन्होंने इसे राजनीतिक दलों का दोहरा चरित्र करार दिया और चेतावनी दी कि देश की महिलाएं अब इस चालाकी को समझ चुकी हैं।


अब यह मुद्दा अब हर गाँव, हर शहर और हर गली में उठेगा
असीजा ने स्पष्ट किया कि यह लड़ाई अब संसद के गलियारों तक सीमित नहीं रहेगी तथा अब यह मुद्दा अब हर गाँव, हर शहर और हर गली में उठेगा, जनता के बीच जाकर उन नेताओं से जवाब मांगा जाएगा जिन्होंने इस मुद्दे पर चुप्पी साधी। प्रिया असीजा ने केंद्र सरकार और सभी संबंधित पक्षों से पुरजोर मांग की है कि इस बिल को बिना किसी देरी के सदन में पुन: लाया जाए, जनगणना या परिसीमन जैसे बहानों के बजाय इसे तुरंत प्रभाव से लागू किया जाए, इसे किसी उपहार की तरह नहीं बल्कि महिलाओं के संवैधानिक अधिकार के रूप में देखा जाए। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र की मजबूती तभी संभव है जब देश की आधी आबादी को नीति निर्धारण और निर्णय लेने वाली मेज पर जगह मिले। महिलाओं को सशक्त बनाए बिना भारत का समग्र विकास केवल एक कल्पना मात्र है।