उत्तर प्रदेश विधानसभा के आगामी मानसून सत्र से सदन में चार भाषाओं के रियल-टाइम अनुवाद की नई व्यवस्था लागू होने जा रही है, जिसके जरिए विधायक अपनी डेस्क पर लगे बटन से अपनी पसंद की भाषा में भाषण सुन सकेंगे। इस प्रणाली में हिंदी, अंग्रेजी, भोजपुरी और अवधी को शामिल किया गया है, जबकि उर्दू को स्थान न मिलने पर समाजवादी पार्टी ने आपत्ति व्यक्त की है।

लखनऊ। उत्तर प्रदेश विधानसभा के आगामी मानसून सत्र से जनप्रतिनिधियों के लिए एक नई और हाईटेक तकनीकी व्यवस्था शुरू की जा रही है। तीन अगस्त से छह अगस्त तक चलने वाले इस सत्र में विधायक सदन के दौरान दिए जाने वाले भाषणों और सवाल-जवाब को अपनी पसंदीदा भाषा में सुन सकेंगे। इस प्रणाली के तहत प्रत्येक सदस्य की टेबल पर चार भाषाओं के विकल्प वाले बटन लगाए गए हैं।

ऐसे काम करेगा अनुवाद सिस्टम

विधानसभा प्रशासन ने इस नई प्रक्रिया को आईपीएल की बहुभाषी कमेंट्री की तर्ज पर विकसित किया है। जब भी कोई सदस्य सदन में अपना वक्तव्य देगा, उसी समय कंट्रोल रूम में तैनात अनुवादक उसका तुरंत अनुवाद करेंगे।

विधायक अपनी डेस्क पर लगे बटन को दबाकर हेडफोन के जरिए संबंधित भाषा में भाषण सुन सकेंगे। फिलहाल इस व्यवस्था में हिंदी, अंग्रेजी, भोजपुरी और अवधी भाषा को शामिल किया गया है।

क्षेत्रीय भाषाओं में सुविधा

यदि कोई जनप्रतिनिधि भोजपुरी या अवधी भाषा में अपनी बात रखता है और अन्य सदस्य इसे समझने में सहज नहीं हैं, तो वे अपनी टेबल पर हिंदी का बटन दबाकर हेडफोन में हिंदी रूपांतरण सुन सकते हैं।

बता दें कि पिछले सत्र के दौरान विधानसभा अध्यक्ष सतीश महाना ने सदस्यों को हिंदी के अलावा अंग्रेजी, अवधी और भोजपुरी में बोलने की अनुमति दी थी। उस समय ही उन्होंने अगले सत्र से इस बहुभाषी तकनीक को लागू करने की जानकारी दी थी।

उर्दू पर शुरू हुई सियासत

नई अनुवाद प्रणाली में उर्दू भाषा को जगह न मिलने पर राजनीतिक बयानबाजी शुरू हो गई है। समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता फखरुल हसन चांद ने इस पर कड़ा विरोध दर्ज कराया है।

सपा प्रवक्ता ने कहा कि उर्दू का जन्म उत्तर प्रदेश के मेरठ में हुआ है और यह हमारी अपनी भारतीय भाषा है। उन्होंने सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी पर इतिहास और भाषाओं की जानकारी न होने का आरोप लगाते हुए उर्दू को बाहर रखने पर सवाल उठाए हैं।