अविनाश श्रीवास्तव, रोहतास। चिराग पासवान और हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा के नेताओं (जीतन राम मांझी और संतोष सुमन) के बीच आरक्षण को लेकर जारी बयानबाजी के बीच आरएलएम सुप्रीमो उपेंद्र कुशवाहा का बड़ा बयान सामने आया है। सासाराम में मीडिया से बातचीत के दौरान उन्होंने इस मुद्दे पर कहा कि, एक ही गठबंधन में रहकर जिस तरह से दो पार्टी के शीर्ष नेताओं का आमने-सामने बयान आ रहा है। ऐसे में वे दोनों नेताओं से आग्रह करेंगे की वे बयानबाजी में उस स्तर तक नहीं जाएं, जहां एक दूसरे की इस्तीफे की बात होने लगे।

लागू आरक्षण के दायरे को बढ़ाने की मांग

उपेंद्र कुशवाहा ने आगे कहा कि, दो अलग-अलग पार्टियां हैं, तो दोनों की अपनी अलग-अलग राय और विचार हो सकती है। अगर विचारों में मतभेद है, तो दो अलग-अलग दलों के विचारों में मतभेद होना कोई अस्वाभाविक नहीं है। इसलिए संयम की जरूरत है। उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी राष्ट्रीय लोक मोर्चा आरक्षण पर कर्पूरी फार्मूला को मानती है और बिहार में यह लागू भी है। वह भी चाहते हैं कि कर्पूरी फार्मूला के तहत जो आरक्षण लागू है, उस आरक्षण के दायरा को और बढ़ाया जाना चाहिए।

क्या है कर्पूरी आरक्षण फार्मूला?

कर्पूरी आरक्षण फार्मूला बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर द्वारा 1978 में लागू की गई एक ऐतिहासिक आरक्षण व्यवस्था थी, जिसका उद्देश्य समाज के अति पिछड़े और वंचित वर्गों को उनका हक दिलाना था। इस फार्मूले के तहत राज्य सरकार की नौकरियों में कुल 26% आरक्षण दिया गया। इसकी खास बात यह थी कि ओबीसी के लिए पूरा आरक्षण एक ही हिस्से में नहीं रखा गया, बल्कि इसे अलग-अलग वर्गों में बांटा गया।

पिछड़ा वर्ग: अपेक्षाकृत बेहतर आर्थिक स्थिति वाले ओबीसी समुदायों के लिए 12% आरक्षित हिस्सा।
अति पिछड़ा वर्ग (एमबीसी): वास्तव में वंचित उप-जातियों के लिए एक अलग 8% संरक्षित हिस्सा, ताकि उन्हें मजबूत ओबीसी समूहों के साथ प्रतिस्पर्धा न करनी पड़े।
महिलाएं: सभी जातियों की महिलाओं के लिए 3% आरक्षण।
आर्थिक रूप से कमजोर उच्च जातियां: तथाकथित अगड़ी समुदायों के गरीबों के लिए 3% हिस्सा।

अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए मौजूदा कोटा में इसे जोड़ने पर, 1978 में बिहार का कुल आरक्षण लगभग 40% हो गया।

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