Bussiness Desk- US-Iran War Oil Crisis : मध्य पूर्व में तनाव शुरू होने के बाद से, अमेरिका, जापान और पाकिस्तान सहित कई देशों ने पेट्रोल और डीजल की कीमतें बढ़ा दी हैं. हालांकि, भारी नुकसान उठाने के बावजूद भारत सरकार ने कीमतें बढ़ाने से परहेज किया है.

28 फरवरी, 2026 को अमेरिका और ईरान के बीच दुश्मनी शुरू होने के बाद से, कच्चे तेल की कीमतें आसमान छू रही हैं. जैसे-जैसे तनाव बढ़ा, कीमतों में तेजी से उछाल आया, जिसके बीच-बीच में कभी-कभार थोड़ी-बहुत गिरावट भी देखने को मिली. कच्चे तेल की कीमतों में इस उछाल का सबसे ज़्यादा असर भारत की सरकारी पेट्रोलियम कंपनियों पर पड़ा है.

तेल कंपनियों को रोजाना ₹1,600–1,700 करोड़ का नुकसान

पिछले 10 हफ़्तों से, भारत में तेल मार्केटिंग कंपनियां रोजाना लगभग 1,600 करोड़ से 1,700 करोड़ तक का नुकसान उठा रही हैं. भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन, हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन और इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन जैसी कंपनियों का नुकसान लगातार बढ़ता जा रहा है.

वे अभी पेट्रोल और डीजल उन कीमतों पर बेच रही हैं, जो दो साल पहले थीं. पिछले 10 हफ्तों में इन कंपनियों ने अपनी उत्पादन लागत से भी कम कीमतों पर ईंधन बेचा है, जिसके कारण उन्हें कुल मिलाकर ₹1 लाख करोड़ से ज़्यादा का नुकसान हुआ है.

क्या सरकार पर बोझ बढ़ेगा?

केंद्र सरकार ने पहले ही संकेत दे दिया था कि वह कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों का बोझ आम जनता पर नहीं डालेगी. नतीजतन जब कच्चे तेल की कीमतें 50% तक बढ़ गईं, तब भी देश में पेट्रोल और डीजल की कीमतें नहीं बढ़ाई गईं.

आज भी, दिल्ली में पेट्रोल की कीमतें लगभग 94 ​​प्रति लीटर हैं, जबकि डीजल लगभग 87 रुपए प्रति लीटर पर बना हुआ है। ये कीमतें पिछले दो सालों के स्तर पर ही बनी हुई हैं.

बढ़ते तनाव का असर गैस की सप्लाई पर भी पड़ा है, फिर भी, इस संकट के बीच सरकार ने घरेलू LPG सिलेंडरों की कीमत में सिर्फ 60 रुपए की बढ़ोतरी की है.

हालांकि, कमर्शियल LPG सिलेंडरों की कीमतों में काफी बढ़ोतरी हुई है. इस महीने की शुरुआत में कमर्शियल सिलेंडरों की कीमत में 933 की बढ़ोतरी की गई थी.

कंपनियां पूंजी कैसे जुटाएंगी?

अगर कच्चे तेल की कीमतों में यह उछाल लंबे समय तक बिना किसी रुकावट के जारी रहता है, तो तेल कंपनियों को भारी मात्रा में पूंजी की जरूरत पड़ेगी. न सिर्फ कच्चा तेल खरीदने के लिए, बल्कि अपने रोजमर्रा के खर्चों को पूरा करने के लिए भी. ऐसी परिस्थितियों में अगर पेट्रोल और डीजल की कीमतें नहीं बढ़ाई जाती हैं, तो इसका वित्तीय बोझ भारत सरकार पर पड़ सकता है.