Dharm Desk- Vat Savitri Vrat : वट सावित्री व्रत सुहागिन महिलाओं अत्यंत महत्वपूर्ण दिन होता है. यह व्रत पति की लंबी उम्र, सुखी वैवाहिक जीवन और परिवार की खुशहाली के लिए रखा जाता है. खासतौर पर नवविवाहित महिलाओं के लिए यह पहला व्रत बेहद खास होता है. जिसमें वे पूरे विधि-विधान और श्रद्धा से पूजा करती हैं. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यह व्रत ज्येष्ठ माह की अमावस्या तिथि को रखा जाता है.

कब शुरू होगी अमावस्या तिथि
अमावस्या तिथि की शुरुआत 16 मई सुबह 5 बजकर 11 मिनट से होगी और इसका समापन 17 मई रात 1 बजकर 30 मिनट पर होगा. उदया तिथि के आधार पर इस बार वट सावित्री व्रत 16 मई, शनिवार को मनाया जाएगा. इस दिस शनि जयंती भी है और इस दिन को शनिचरी अमावस्या भी कहा जाता है.
बरगद पूजा और कथा सुनने का विशेष धार्मिक महत्व
इस दिन महिलाएं वट वृक्ष यानी बरगद के पेड़ की पूजा करती हैं और सावित्री-सत्यवान की कथा सुनती हैं. सावित्री ने अपने तप, प्रेम और दृढ़ संकल्प से यमराज से अपने पति सत्यवान का जीवन वापस प्राप्त किया था. इसी कारण यह व्रत अखंड सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है.
वट वृक्ष का इस व्रत में विशेष महत्व है. धार्मिक विश्वास के अनुसार इसमें ब्रह्मा, विष्णु और महेश का वास होता है. महिलाएं बरगद के पेड़ के चारों ओर कच्चा सूत सात बार लपेटती है. जो पति की रक्षा, दांपत्य सुख और परिवार की समृद्धि का प्रतीक माना जाता है.
इन नियमों का पालन करना चाहिए
व्रत के दौरान मन, वाणी और व्यवहार को शांत व सकारात्मक रखना जरूरी माना गया है. कई महिलाएं इस दिन निर्जला व्रत भी रखती हैं, हालांकि स्वास्थ्य के अनुसार व्रत रखने की सलाह दी जाती है. पूजा के समय सोलह श्रृंगार करना भी इस दिन की परंपरा का अहम हिस्सा है.
अन्न, जल दान से पूर्ण होता है व्रत
व्रत पूर्ण होने के बाद बड़े-बुजुर्गों का आशीर्वाद लेना शुभ माना जाता हैं. साथ ही अन्न, फल और वस्त्र का दान करने से पुण्य फल की प्राप्ति होती है. यह व्रत न केवल आस्था का प्रतीक है, बल्कि वैवाहिक जीवन में प्रेम, विश्वास और समर्पण को मजबूत करने का भी माध्यम माना जाता है.
- छत्तीसगढ़ की खबरें पढ़ने यहां क्लिक करें
- लल्लूराम डॉट कॉम की खबरें English में पढ़ने यहां क्लिक करें
- मनोरंजन की बड़ी खबरें पढ़ने के लिए करें क्लिक

