सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय रेलवे में सुधारों और यात्रियों की सुरक्षा को लेकर अहम फैसला सुनाया है. इसके साथ ही कोर्ट ने रेलवे के दस्तावेजों में इस्तेमाल होने वाले सेकंड क्लास पैसेंजर यानी द्वितीय श्रेणी यात्री शब्द पर कड़ी आपत्ति भी जताई है. जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने शुक्रवार को कहा कि किसी यात्री की श्रेणी उसके खर्च से तय नहीं होनी चाहिए.
रेलवे के नियमों में इस्तेमाल होने वाले ‘सेकेंड क्लास पैसेंजर’ शब्द पर आपत्ति जताते हुए कोर्ट ने कहा कि ‘सेकेंड क्लास’ का संबंध कोच से होना चाहिए, यात्री से नहीं.
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि भारत के इतिहास में वर्ग विभाजन की पृष्ठभूमि को देखते हुए, किसी व्यक्ति को इस तरह संबोधित करना संविधान की मूल भावना के विपरीत है. जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने कहा कि इसलिए भविष्य में श्रेणी का उल्लेख यात्री के बजाय केवल कोच या डिब्बे के संदर्भ में ही किया जाना चाहिए.
ट्रेन हादसे में जान गंवाने वाले एक यात्री के कानूनी डॉक्यूमेंट में सेकंड क्लास पैसेंजर शब्द के इस्तेमाल पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी आपति जताई है. कहा कि इस तरह की भाषा संविधान की समानता और गरिमा की भावना के अनुरूप नहीं है.

सुप्रीम कोर्ट ने रेलवे सुरक्षा व्यवस्था और यात्रियों की सुविधा से जुड़े मुद्दों पर टिप्पणी करते हुए रेल से गिरने से मौत होने पर यात्री की पत्नी को राहत देते हुए रेलवे क्लेम ट्रिब्यूनल और मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के फैसले को पलट दिया है.
मृतक के पास से यात्रा टिकट नहीं मिलने के आधार पर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने उसे गैर-टिकट यात्री माना था, जिस फैसले को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया. मृतक की पत्नी ने अपने हलफनामे में स्पष्ट रूप से बताया था कि उनके पति के पास वैध रेलवे टिकट था, लेकिन दुर्घटना के दौरान उनका बैग गुम हो गया.
ट्रेन हादसे में जान गंवाने वाले एक व्यक्ति के परिवार को 8 लाख रुपए मुअवाजा देने का आदेश देते हुआ कहा कि पहले के न्यायिक फैसलों के अनुसार, मृत यात्री के पास से टिकट बरामद न होना अपने आप में उसे वैध यात्री के दर्जे से वंचित नहीं करता.
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